कहानी

समय !

समय किसी के लिए नहीं रुकता ये हम सब जानते हैं। कभी  कभी बहुत कुछ पाने की होड़ में हम अपना बहुत कुछ खो देते हैं और समय आगे निकल जाता है।
शंभु रोज़ की तरह अपने काम में व्यस्त था,अंधेरा हो रहा था। तभी शंभु को याद आया कि आज लक्ष्मी ने जल्दी घर आने को कहा था।अब रोज़ रोज़ देर से आने में शंभु को भी दबाब रहता क्योंकि लक्ष्मी भी  नाराज़ रहने लगी थी,बात सिर्फ नाराज़गी तक होती तब भी ठीक था पर बात अब ज्यादा बड़ गई थी, एक तो दोनो पति पत्नी अकेले अपने शहर से दूर और उस पर सारा दिन लक्षमी मालिक के दिए एक कमरे में रहती। फैक्ट्री शहर से दूर थी यहां मुश्किल से कोई अपना मिलता था,उस पर शंभु पर काम का इतना बोझ था कि पल भर की फुर्सत नहीं थी। तख्ववाह तो ठीक थी और कमरा भी  रहने को मिल गया था कमी थी तो बस समय की। लक्षमी बार बार कहती मालिक से कहकर थोड़ा जल्दी छुट्टी ले लिया करो घर का सामान भी  लाना होता है और मैं भी  अकेले परेशान हो जाती हूँ ।तुम देर रात ओवरटाइम कर के आते हो और इतने थके होते हो कि आते ही खाना खाकर सो जाते हो, कभी  कहीं लेकर भी  नहीं जाते। साल में कभी  दो साल में चार पाँच दिन के लिए अपने शहर ले जाते हो बस। शंभु भी  समझता था पर डरता था नौकरी न चली जाए। फैक्टरी में काम भी  जोर का थाजो लक्ष्मी के बस का नहीं था, और इतने साल हो गए थे शादी के कोई औलाद भी  नहीं थी। तकरीबन रोज़ ही दोनो में समय को लेकर झगड़ा होता। एक दिन तो लक्षमी गुस्से में आ गई। घर के बर्तन बजाने लगी शंभु ने डांटा तो अजीब बातें करने लगी वो डर गया और मालिक से कह कर झाड़ फूंक वाले के पास गया पर ये बातें अब बड़ने लगी थी साथ में काम करते मज़दूर ने कहा शायद अकेले रहते दिमाग पर असर हुआ है इसे घर छोड़ आओ। शंभु डर गया था मालिक से पैसा एडवांस लेकर लक्ष्ममी को मायके छोड़ दिया और अपनी सास से इलाज कराने को कह आया। वापिस लौटा तो फिर जाना संभव नहीं हो पाया। फोन पर बात होती रही , फिर एक दिन लक्षमी की मां ने शंभु को फोन पर कह दिया अब इसे कभी लेने मत आना भले गरीबी है पर बेटी की हालत जो तुमने की है कभी  नहीं भेजूंगी तुम्हारे साथ रहो अकेले और करते रहो सारा दिन बस काम ही। शंभु क आँखें भर आई थी वो लक्षमी बहुत प्यार करता था पर बेबस हो गया था। कहाँ से लाता वो समय। अगर समय लाता तो इतनी महंगाई में दो समय का खाना कैसे खिलाता। शंभु अब शराब पीने लगा था। मालिक ने शंभु को दुखी देखकर और ऐसी हालत देखकर कारण पूछा तो शंभु की आँखों से आंसू छलक आए उसे लगा उसकी गृहस्थ जीवन अब ठीक नहीं हो पाएगा। जब मालिक को सारे हालात के बारे में बताया और थोड़ा जल्दी छुट्टी देने को कहा ओवरटाइम कम करने को कहा। मालिक भी  उसकी हालत को समझ गया था उसने कहा भुला लो पत्नी को और ध्यान रखो उसका। आज से औवरटाईम सिर्फ त्योहार पर करना, शंभु की आँखों में चमक वापिस लौट आई थी। फोन पर भाई संग वापिस आने को कहा। लक्षमी भी  कहाँ खुश थी शंभु के बिना और कुछ दिनो बाद वापिस शंभु के पास आ गई।

कामनी गुप्ता

माता जी का नाम - स्व.रानी गुप्ता पिता जी का नाम - श्री सुभाष चन्द्र गुप्ता जन्म स्थान - जम्मू पढ़ाई - M.sc. in mathematics अभी तक भाषा सहोदरी सोपान -2 का साँझा संग्रह से लेखन की शुरूआत की है |अभी और अच्छा कर पाऊँ इसके लिए प्रयासरत रहूंगी |