कविता

तुम्हारा एक नाम रखूं ?

तुम्हारा
एक नाम रखूं ?
क्या नाम रखूं
तुम्हारा !
प्रेम !
नहीं तुम्हारा नाम प्रेम नहीं !
वो प्रेम ही क्या
जो छुपाया जाये।

नफरत !
नहीं नफरत भी नहीं !
मेरे शब्दकोष में
यह शब्द ही नहीं है।

इंतज़ार !
नहीं इंतज़ार भी नहीं !
साथ रहने वालों का
कैसा इंतज़ार।

धोखा !
हाँ तुम धोखा ही हो ,
छलिया हो ,
भ्रम ही तो हो
यही नाम रखूंगी तुम्हारा।

जिक्र होगा जब कभी
धोखे का
तुम्हारा ही नाम आएगा
भ्रम में रहेगा सारा संसार
और हर बार छला जायेगा।

*उपासना सियाग

नाम -- उपासना सियाग पति का नाम -- श्री संजय सियाग जन्म -- 26 सितम्बर शिक्षा -- बी एस सी ( गृह विज्ञान ), महारानी कॉलेज , जयपुर ज्योतिष रत्न , आई ऍफ़ ए एस दिल्ली प्रकाशित रचनाएं --- 6 साँझा काव्य संग्रह, ज्योतिष पर लेख , कहानी और कवितायेँ विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती है।

9 thoughts on “तुम्हारा एक नाम रखूं ?

  • विजय कुमार सिंघल

    आपकी कविता जिंदगी के एक सत्य को व्यक्त करती है. प्रेम के नाम पर धोखा आज आम हो गया है. आज सच्चा प्रेम गायब है, उसके नाम पर बस छलावा और शारीरिक आकर्षण है.
    सुन्दर कविता के लिए बधाई. आगे भी आपसे ऐसी रचनाओं की आशा है.

    • उपासना सियाग

      हार्दिक धन्यवाद

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    किसी चीज़ को अच्छी कहने के लिए कहेंगे , it is vikid!! सौरी कुछ मिस हो गिया था .

    • विजय कुमार सिंघल

      भाई साहब, अगर कोई कमेंट अधुरा रह जाये या गलत हो जाये तो उसे edit करके सही कर सकते हैं. इसके लिए उसके ठीक नीचे बटन होता है.

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    उपासना जी , बहुत अच्छी कविता . पियार में धोका , बेफाई छलिया जैसे शब्द उम्र भर सुनता आ रहा हूँ . शाएद यह शब्द पियार के कोष में हसीन बन गए है जैसे अंग्रेजी वाले किसी चीज़ को कहेंगे , it is vikid!!

    • उपासना सियाग

      🙂 🙂 आभार

  • राजीव उपाध्याय

    जिक्र होगा जब कभी

    धोखे का

    तुम्हारा ही नाम आएगा

    भ्रम में रहेगा सारा संसार

    और हर बार छला जायेगा।
    वाह क्या बात है उपासना जी।

    • उपासना सियाग

      बहुत शुक्रिया जी

      • राजीव उपाध्याय

        धन्यवाद उपासना जी

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