लघुकथा

पिता की बेबसी

मैं पत्नी और अपने दो छोटे बच्चों को लेकर कुछ महीनों पहले ही गाँव से दिल्ली आया था। वो जनवरी की ठिठुरती हुई रात थी। मेरे ऊपर ठंडा पानी गिरने से मैं हड़बड़ाकर उठा। खिड़की की झिर्री से सड़क से आती रोशनी में मैंने देखा कि मेरा ढाई साल का मुन्ना हाथ मे मग लिए खड़ा था। मैंने आव देखा ना ताव एक जोरदार चांटा उसके गाल पर चिपका दिया।
चांटे और मुन्ने की मिली-जुली आवाज से दूसरी रजाई में चार-पाँच साल की बेटी के साथ सोई हुई उसकी मम्मी भी हड़बड़ाकर जाग गई। उसने कमरे की बत्ती जलाई और मुझसे पूछा– क्या हुआ?
मेरा शरीर तो ठंड से कांप रहा था लेकिन दिल गुस्से से जल रहा था। मैंने उससे कहा– मेरे से क्या पूछती है, पूछ अपने लाडले से ? इतना कहकर मैं गीले बिस्तर को समेटने लगा। गीला बिस्तर और चांटा खाने के बाद भी रोते हुए मुन्ने के हाथ मे मग देखकर पत्नी भी माजरा समझ गई। उसने मुन्ने से पूछा– क्यों रे, ये तूने क्या किया? पानी गिराकर बिस्तर भिगो दिया, अब तेरे पापा कैसे सोएंगे?
मुन्ना और जोर से रोने लगा तो उसकी मम्मी ने उसे अपने सीने से चिपटा लिया। मुझे कपड़े देते हुए बोली– लो पहले अपने कपड़े बदल लो। आपको ठंड लग जायेगी।
कपड़े बदलते ही तो मुझे जोर से कम्पकम्पी चढ़ गई।
पत्नी, मुन्ने को गोद मे उठाये परेशान सी कभी मुन्ने को डांटती कभी गले लगा लेती। मुझसे बोली– थोड़ी चाय बना देती हूँ ठंड उतर जाएगी फिर आप दोनो बच्चो को लेकर मेरी रजाई में सो जाना।
मैंने उससे पूछा — और तुम? वो बोली– आप सो जाओ, मैं बैठकर स्वेटर बुन लूँगी। आपको तो सुबह काम पर भी जाना है, मैं तो दिन में सोकर भी नींद पूरी कर लूँगी।
चाय बनकर तैयार हो गई तो मुझे चाय देकर उसने संदूकची से एक शॉल निकाला और फर्श पर बिछाकर बैठ गई। दरअसल हमारे पास चारपाइयाँ भी नहीं थी।
मुन्ना इस सब के बीच भी गुमसुम था। उसकी माँ उसे चाय पिलाने लगी तो उसने अपने नन्हे हाथ से कटोरी एक तरफ कर दी। अपनी मम्मी की गोद मे रहकर भी वह मुझे ही घूरे जा रहा था।
चाय पीकर मेरी ठंड उतरने लगी तो तो मुझे मुन्ने पर प्यार आने लगा। आज कितने ही दिनों बाद तो ठीक से उसका चेहरा देखा था। बेटी को तो सुबह स्कूल छोड़ते हुए ही काम पर जाता था तो दो बात भी हो जाती थी। प्यार से दुलारते हुए मैंने मुन्ने से कहा– जा जा , मेरे पास आ जा।
वो तो जैसे कि इसी पल का इंतज़ार कर रहा था। अपनी मम्मी की गोद से उछलकर तुरन्त मेरे पास आ गया और बोला — पापा, जब मैं छो दाता हूँ तब तुम आते हो औल जब मैं छो तर उत्ता उँ तब तुम ताम पल तले जाते हो, मुझे अच्छा नई लत्ता।
मुन्ने की तोतली जुबान से कहे ये शब्द मेरे दिल पर ऐसे लगे कि जिन्दगी में पहली बार अपनी गरीबी और बेबसी पर रोना आ गया। दरअसल इन दिनों दो पैसे ज्यादा कमा लेने का लालच कहो या मजबूरी, मैं एक कि बजाय डेढ़ दिहाड़ी लगा रहा था।

नीता सैनी, दिल्ली

नीता सैनी

जन्म -- 22 oct 1970 शिक्षा -- स्नातक लेखन -- कविता , लघुकथा प्रकाशन -- पत्र -पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित संपर्क -- घर का पता 117 , मस्जिद मोठ , नई दिल्ली - 110049 पत्र व्यवहार के लिए ऑफिस का पता -- नीता सैनी - न्यू जगदम्बा टेंट हाउस L - 505 / 4 -- शनि बाजार संगम विहार , नई दिल्ली - 80