कविता

छिनता बचपन

यह कैसी विडंबना है कि
देश तरक्की की राह पर
आगे बढ़ रहा है,
फिर भी देश आज भी
बाल मजदूरी का दंश सह रहा है।
आज भी बच्चों का
बड़ा हिस्सा बाल मजदूरी की
भेंट चढ़ रहा है,
जाने अनजाने
छिनता बचपन
भूख की विवशता
पारिवारिक मजबूरियों की
लाचारी बेबसी के चलते
उनका बचपन छिन रहा है।
यह कैसी लाचारी है
कि आनेवाले कल भविष्य
आज बाल मजदूरी कर
पिस रहा है।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921