लघुकथा

दूरी

जैसे ही साहब की गाड़ी का हॉर्न सुनाई दिया शीशराम दौड़ा। गाड़ी का दरवाजा खोला लेकिन ये क्या! पीछे की सीट खाली थी। आगे देखा तो साहब खुद ही ड्राइवर की सीट पर थे। दौड़ कर ड्राइवर वाले गेट की तरफ पहुंचा,जैसे ही गेट खोलने को हाथ बढ़ाया,साहब ने रुकने और पीछे हटने का इशारा किया। साहब गाड़ी से उतरे और पीछे का गेट खोलकर खुद ही बैग उतारने लगे। शीशराम को कुछ समझ में नहीं आया। लगता है ड्राइवर ने बिना बताये छुट्टी ली होगी तभी साहब नाराज हैं आज। ये नाथूलाल है ही लापरवाह! शीशराम मन ही मन गुस्साया।
साहब ने गाड़ी का गेट बंद किया और ऑफिस की ओर चल पड़े। शीशराम बैग पकड़ने के इंतज़ार में खड़ा ही रह गया। साहब को जाता देख वो पीछे-पीछे दौड़ा। ऑफिस का दरवाजा खोलने को हुआ कि साहब ने फिर पीछे हटने का इशारा किया। अंदर जाकर साहब अपनी कुर्सी पर बैठ गए। शीशराम अंदर गया और रोज की तरह पानी की बोतल उठाकर पानी गिलास में डालने लगा। साहब अचानक बहुत तेज चिल्लाये,शीशराम!तुम समझ क्यों नहीं रहे हो। दूर रहो! इतनी भयानक महामारी फैली है। दूरी बनाकर रखो। मैं खुद कर लूँगा अपने सारे काम। शीशराम का हाथ वही रुक गया। उसने सर झुकाया,नाक से नीचे खिसक गए मास्क को ऊपर किया और बाहर निकल गया।

लवी मिश्रा

कोषाधिकारी, लखनऊ,उत्तर प्रदेश गृह जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश