कविता

जीवन संध्या

जैसे जैसे जीवन संध्या
के दिन निकट हैं आते जाते
नये विचारों की आहट से
मन में भाव उमड़ते जाते ।।

जल्दी से सब-कुछ करने की
चाहत दिल में शोर मचाती
कल परसों पर मत टालो अब
निंदिया भी झकझोर बताती ।।

यह मत सोचो अब तक
क्यों हम सोए रहे थे
अपनी ही मस्ती में
क्यों कर खोए रहे थे
अब जागे हो अब से
अपनी कमियां सुधारें
भूले बिछड़े यारों के संग
बैठे, थोड़ा समय गुजारें ।।

जो भी कड़वी यादें बाकी
उनको दिल से शीघ्र मिटा दें
मन को बिल्कुल हल्का करके
सर से गम का बोझ हटा दें ।।

खुद भी रहें प्रसन्न और स्वस्थ
औरों को भी तरकीब बता दें
जीवन के दिन चार हैं बाकी
आओ इनमें चांद सजा दें ।।

नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई