लघुकथा

जमीर

“ये कैसी रिपोर्ट तैयार की है तुमने यादव जी ? विपक्ष से कोई सवाल नहीं, उल्टे सरकार को ही घेर लिया है। तुम्हारी  यह रिपोर्ट दिखाकर हम मंत्री जी से पंगा नहीं ले सकते। जाओ, और इसे और सुधार कर ले आओ।” लैपटॉप बंद करते हुए चैनल के एडिटर ने रिपोर्टर को डाँट पिलाई।
“तस्वीरों को कैसे झुठलाया जा सकता है सर ? लोग नासमझ नहीं, सब समझते हैं,..  और फिर आम लोगों के मुद्दे उठाना ही तो असल पत्रकारिता है सर !” रिपोर्टर ने विनम्रता से अपनी बात कही।
  “अच्छा,.. तो अब हमें पत्रकारिता भी तुमसे सीखनी होगी ?” एडिटर ने आँखें तरेरीं।
 “सरकारी योजनाओं के बारीकियों की विस्तार से चर्चा करके उसके फायदों को हाईलाइट करो। जनता को यह समझाने का प्रयास करो कि होहल्ला मचाना तो विपक्ष का काम ही है। हमारा चैनल विज्ञापनों की कमाई से चलता है, जनता के रहमोकरम पर नहीं कि हम उनकी परवाह करें।” एडिटर ने बात साफ की।
“शुक्रिया सर, आपने बात साफ कर दी, लेकिन मैं अपने जमीर को मारकर जनता के भविष्य से खिलवाड़ नहीं कर सकता। विज्ञापनों से मिलनेवाली काली कमाई आप रख लीजिए और अपना जिंदा जमीर मैं रख लेता हूँ। ये रहा मेरा इस्तीफा।”
“लेकिन ..!”
“लेकिन वेकिन कुछ नहीं सर। अपने जमीर को मारकर अगर मैंने पूरे दुनिया की दौलत कमा भी ली, तो कभी खुद को दर्पण में नहीं देख सकूँगा, कभी खुद से नजरें नहीं मिला पाउँगा।” कहते हुए उसके निर्भीक कदम दफ्तर से बाहर की तरफ बढ़ गए।

*राजकुमार कांदु

मुंबई के नजदीक मेरी रिहाइश । लेखन मेरे अंतर्मन की फरमाइश ।