सामाजिक

इश्क करना गुनाह नहीं अश्लीलता फ़ैलाना गुनाह है

आजकल के युवाओं के लिए प्रेम का अर्थ एहसासों की आप ले करने से ज़्यादा शारीरिक उन्माद को शमन करने का ज़रिया बन गया है। चलो मान लेते है एक उम्र के चलते उन्मुक्त होते हल्की सी हद पार हो जाती है। पर जो क्रिया शादी के बाद सात फ़ेरे लेकर, विधिवत पति-पत्नी बनने के बाद बंद दरवाज़े के पीछे अकेले दो लोगों के बीच होनी चाहिए वो अब खुल्लम-खुल्ला होने लगी है। इश्क करना हरगिज़ गुनाह नहीं अश्लीलता फ़ैलाना बेशक गुनाह है।
समय के साथ प्यार करने का तरीका भी बदल गया है। जगह की कमी की वजह से या महंगे होटलों में रोज़-रोज़ मिल पाने में असमर्थ होने की वजह से; प्रेमी जोड़े सार्वजनिक स्थलों का रुख़ करते पार्क गार्डन और थिएटर को घूमने और मनोरंजन की जगह के बदले प्रेम क्रिड़ा का मैदान बना रहे है। आसपास के लोगों की उपस्थिति को अनदेखा करते लड़के, लड़कियाँ एक दूसरे से चिपक कर प्रेम क्रिया में इतने डूबे होते है कि पार्क के वाॅचमैन को पास में खड़ा रहकर लाठी ज़मीन पर ठोक कर दोनों को हिदायत देनी पड़ती है कि अलग हो जाओ, कुछ तो शर्म करो ये पब्लिक प्लेस है फिर भी अलग नहीं होते। या तो किसी पेड़ के नीचे एक ही दुपट्टे में लिपटे सो रहे होते है। सुबह जब सैलानी वाॅकिंग करने पार्क में जाते है तो काॅन्डम चप्पल से चिपक जाते है।
आजकल की युवा पीढ़ी ने शर्म और संस्कार मानों बेच खाए हो।
सोलह साल की लड़कियाँ और बीस साल के लड़के प्रेम के नाम पर शारीरिक उन्माद का शमन कर रहे होते है। न उम्र होती है, न प्रेम की परिभाषा मालूम होती है! महज़ शारीरिक आकर्षण को प्रेम का नाम देकर परिवार वालों की पीठ पीछे गंदगी के गुल खिला रहे होते है।
ऐसे ही मनचले प्रेमियों की हरकत के चलते कुछ शहरों में पार्क को म्युनिसिपल कार्पोरेशन वालों ने ताले लगा दिए है। थियेटर में फ़िल्म देखने जाओ तो वहाँ पर भी वही हाल। आगे वाली राॅ या अगल-बगल से प्रेमियों के वार्तालाप, चुम्बनों की आवाज़ और बेशर्मी का तांडव दिख ही जाता है। पर्दे पर चल रही फ़िल्म देखें या आसपास चल रही। तब ख़याल आता है कि समाज किस दिशा में जा रहा है? सरेआम लड़के लड़कियाँ प्रेम के नाम पर छिछोरेपन का प्रदर्शन कर रहे होते है। उनको तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता पर टहलने आए या फ़िल्म देखने आए बड़े, बुज़ुर्ग बेचारे शर्म के मारे नतमस्तक होते रास्ता बदल लेते है। हर शहर में इस छिछोरेपन पर रोक लगाने के लिए पुलिस या कार्यकर्ता नियुक्त करने की जरूरत है। साथ ही माँ-बाप को अपने बच्चों को सही समझ देकर समाज को साफ़ सुथरा बनाने की जरूरत है। बच्चे कहाँ जाते है, क्या करते है और कैसे मित्रों की संगत है इसकी खबर रखनी चाहिए। संस्कार घर से ही मिलते है संगत बाहर से मिलती है। ऐसे पब्लिक जगहों पर लड़के, लड़कियाँ ऐसी हरकत करते जब पकड़े जाते है तब खुद तो दुपट्टे से या रूमाल से मुँह छुपाकर नतमस्तक होते है, साथ में परिवार की इज़्जत भी डूबोते है।
क्यूँ युवाओं की अशालीनता के प्रति कोई  जागरूक नहीं होता? कहीं न कहीं उनकी शर्मनाक हरकतों को सभी देखते ही होंगे, अभी ये हाल है तो आगे जाकर क्या-क्या देखने को मिलेगा इस दिशा में जल्दी ही कोई ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
— भावना ठाकर ‘भावु’

*भावना ठाकर

बेंगलोर