ग़ज़ल
बारहा दर्द मुझको दिखाए नहीं।
ज़िंदगी से कहो आजमाए नहीं।।
मैं कशमकश में हूं आजकल यार मेरे।
मुझको अपना ये जलवा बताए नहीं।।
खीज होती है सुनकर मुझे बात भी।
आँख फूटी ये मुझको यूं भाए नहीं।।
क्या इरादा है इसका जरा पूछो तुम।
साख पर लाके मुझको गिराए नहीं।।
ख़ाक हो जाउंँगी इस तरह मैं यहांँ।
दुश्मनी मुझसे ऐसे निभाए नहीं।।
मैं तो बदनाम हो जाउंँगी उसके लिए।
यूं मुहब्बत का दस्तूर लाए नहीं।।
— प्रीती श्रीवास्तव