विश्वशांति का समय है ये
जिसके शरण में जाना है आप जाओ जी
बमुश्किल संविधान की शरण हम पाये हैं।
छल कपट से भरा रहा है उनका ये सफर,
हकमारी हथियार सदा से वो अपनाए हैं।
यहां फंस कर रह जाये जनता सदा सदा
हर स्तर पे तवायफी मीडिया वो लगाए हैं।
शहीदों का यहां बहा हुआ हर एक कतरा,
उस कतरे को भी बेचने की मंशा बैठाए हैं।
अस्पृश्यता की जाल में मरते वो सदियों से
रूप बदल अस्पृश्यता को फिर वो लाए हैं।
पाखंड जांचते रहते वो नित नए लफड़ों से,
मन की कोमल भाव संग नाले में कुदाये हैं।
शिक्षा की बर्बादी रहा हमेशा गुप्त एजेंडे में
विद्यालय तोड़के आस्थाई जुगनू जलाए हैं।
तर्क-वितर्क,विज्ञान और शिक्षा भाड़ में जा
हजारों कोसों तक जन जन को चलाए हैं।
जात पात,सम्प्रदाय का नफरती खेल यहां
अब तक बांटने वाला चाल क्यों अपनाये हैं।
समता,समानता और विश्वबंधुत्व की बातें
बुद्ध,अम्बेडकर के धरती में क्यों भुलाये हैं।
— राजेन्द्र लाहिरी