कहानी

कहानी – भटकी हुई आत्मा

बात उन दिनों की है जब मैं स्थानांतरित होकर इस घाटी में नया नया आया था और धारपुर के प्राइमरी स्कूल में अध्यापक   के तौर  पर जॉइनिंग किया था । मेरी उम्र भी उस समय लगभग पैंतीस वर्ष की रही होगी। 

धारपुर सड़क से लगभग 10 किलोमीटर पैदल पहाड़ के मध्य में स्थित था। इसी गांव के बीचों बीच मेरा स्कूल था। गर्दन को टेढ़ी करके ऊंचे पहाड़ की छोटी को देखना पड़ता था। सामने घने देवदारों के जंगल और कभी-कभी तो भालू झुंडों में सामने जंगल में चलते हुए दिखाई देते। खैर यहां के लोग तो इन जंगली जानवरों को देखने के अभ्यस्त थे। वे जानते थे पहाड़ में किस तरह इन जानवरों से बचाव करते हैं ।

परंतु मेरे लिए यह सब नया था । हालांकि मैं भी पहाड़ से था। परंतु मैंने इस तरह भालुओं के झुंड बेख़ौफ़ होकर घूमते हुए कभी नहीं देखे थे। 

भालुओं के ये झुंड कभी जंगल से बाहर निकल कर धार पर घूमते हुए नजर आते तो कभी जंगल में गुम हो जाते।

 कोई दिन ऐसा नहीं होता जिस दिन सामने ये दिखाई नहीं देते..।

जंगल में और भी जानवर दिखते थे। रंग-बिरंगे पक्षी भी दिखते थे । इसी दौरान हिमाचल का राज्य पक्षी मोनाल भी यहीं जंगल में देखा। मेरे लिए यह सब नया अनुभव था।

नैसर्गिक प्रकृति का खूबसूरत रूप यहां नर्तन करता हुआ लगता था…।

 बेशक यह गांव आधुनिक सुविधाओं से लैस नहीं था। उस समय न सड़क न बिजली यहां उपलब्ध थी। हां पानी का नल स्कूल के बगल में गांव के बीचों-बीच था । जिसमें 24 घंटे पानी बहता रहता था । पास ही दरिया था छोटा सा यूं तो लोग इसे नाला कहते थे परंतु उस नाले को पार करना पुल के बिना संभव नहीं था इसलिए इसको मेरे हिसाब से दरिया कहना ही ज्यादा उचित रहेगा…। 

इस पहाड़ पर मेरे स्कूल से आगे और भी तीन स्कूल थे। एक मिडल स्कूल और दो प्राइमरी स्कूल। 

 उसके पश्चात धार को पार करके जम्मू कश्मीर का डोडा क्षेत्र लगता था। यह चंबा और जम्मू कश्मीर का सीमांत क्षेत्र था। 

आतंकवादी गतिविधियों के कारण यह क्षेत्र भी सेंसिटिव था। इसलिए यहां सरकार ने पैरा मिलिट्री की कुछ टुकड़ियों लगाई हुई थीं । जो जम्मू की ओर से आने वाले आतंकवादियों की निगरानी करती थीं ।

ताकि आतंकवादी इस तरफ घुसकर वारदात न कर दे । क्योंकि इससे पहले इसी क्षेत्र में एक बहुत बड़ी वारदात हुई थी जिसमें स्थानीय पैंतीस मजदूरों को रस्सियों से बांधकर गोलियों से भून दिया गया था।

 कुछ लोगों को वे अपने साथ ले गए थे अपना सामान उठाने के लिए।

 आज तक उनका पता नहीं लगा कि वे बेचारे जिंदा हैं या मरे हुए ।

इस वारदात के बाद इस क्षेत्र में पैरामिलिट्री लगाई गई थी ।

मेरे स्कूल के पास ही बगल में इनका  ट्रांसिट केंप था। अक्सर जवान घर से आते या घर जाते तो यहां रुकते थे।

 फिर ऊपर अपनी पोस्ट पर चले जाते थे ।

यह गांव उस समय 8 -9 घरों वाला गांव था ।

सभी घर कच्चे थे परंतु लोग दिल के बहुत अच्छे थे। मुझे तो कभी नहीं लगा कि मैं परदेसी हूं …।खूब घुल मिल गया था उनके साथ।

 सुख-दुख बांट लेता था ऐसे लगता था जैसे सभी लोग अपने परिवार के ही  हो…। 

वैसे मैं वहां उस गांव में नहीं रहता था। शाम को दूसरे गांव में आ जाता था जहां मेरा रूम था ।सिर्फ स्कूल का समय ही वहां  गुजारता था। परंतु गांव की हर एक गतिविधि  स्टाफ वाले बता देते थे…।

स्कूल के बगल में ही तीन-चार घरों को छोड़कर दो कमरों का छोटा सा मिट्टी का कच्चा घर विमला का था ।

वह अकेली रहती थी उसके कोई बच्चा नहीं था । कुछ साल पहले उसके पति का स्वर्गवास हो गया था। लगभग उसकी उम्र 40 साल के ऊपर रही होगी परंतु लगता नहीं था कि उसकी उम्र चालीस के पार होगी।

  सफेद गोरा चेहरा नीले तीखे नयन घने भूरे बाल और लंबा भरा भरा शरीर और बोलचाल बहुत ही मीठी। 

किसी को भी आकर्षित करने के लिए पर्याप्त थीं विमला की ये खूबियां…।

मैं कुछ दिनों से नोटिस कर रहा था एक युवा तीस  बतीस वर्ष का पतला शरहरा शरीर बड़ी-बड़ी लंबी मूंछें लंबी कद काठी देखने में खूबसूरत उसके आंगन में बैठा होता..।

कभी वह विमला के साथ खेतों में काम करने चला जाता तो 

कभी विमला पशु चराने जाती तो उसके साथ-साथ पशु चराने चला जाता आसपास के खेतों में…।

 पहले तो मुझे पता नहीं चला मैंने सोचा कोई विमला का रिश्तेदार होगा जो इसके पास आता रहता है। 

 क्योंकि अकेली औरत है तो रिश्तेदारी में इसका ध्यान रखने के लिए रिश्तेदार अपने लड़के को भेज देते होंगे ।

वह दो-तीन दिन वहां रहता फिर चला जाता।

 हफ्ते दस दिन के बाद फिर आ जाता एक-दो दिन रहता फिर चला जाता…। मैं कई दिनों से यह सब देखता रहा तो एक दिन मैंने अपने चपरासी सुखदेव से पूछ ही लिया-“सुखदेव यह लड़का कई दिनों से मैं यही देख रहा हूं आता है फिर चला जाता है दस पंद्रह दिनों के बाद फिर आ जाता है यह कौन है…?”

तब सुखदेव ने बताया-  “सर यह भटकी हुई आत्मा है और वह खिल खिलाकर हंस पड़ा…।”

मैंने सुखदेव को हंसते हुए देखा तो फिर पूछा-” तुम्हारे कहने का मतलब..?”

तब वह बोला-सर यह फौजी है आपके आने से पहले यह यहीं ट्रांजिट कैंप में रहता था फिर इसकी यहा से इनकी यूनिट है ट्रांसफर हो गई और इसको जाना पड़ गया…।

कई बार  रात को जब बाकी फौजी सो जाते तो यह वहां से भाग कर यहां आ जाता और रात रात में ही सुबह होने पर वापस ड्यूटी पर पहुंच जाता ..। 

धीरे-धीरे इसकी यूनिट में वहां पता लग गया सबको तो इसका रात में आना बंद हो गया ।

अब जिस दिन छुट्टी होती है उस दिन यह छुट्टी लेकर यहां पहुंच जाता है उसने मुस्कुराते हुए  सारी बात बता दी थी… ।

मैं उसकी बात से सब समझ गया। 

मैंने कहा- “इसकी उम्र तो उससे छोटी लगती है और वह तो उम्र में भी इससे काफी बड़ी है… ।”

सुखदेव बोला-” सर इश्क में उम्र कौन देखता है?”

और वह फिर हंस दिया। 

परंतु मुझे कुछ अटपटा लगा। “यह आदमी अपना घर बार भूलकर  किस चक्कर में पड़ गया है?”

मेरे भीतर मन ने अंदर ही अंदर कहा…।

उसके बाद वह आता जाता तो कभी कभार हमारा  आमना सामना भी हो जाता । वह मुझसे हाथ मिला लेता और कभी-कभी बरामदे में आकर मेरे पास बैठ भी जाता। 

पहले तो उसे पूछने की कभी हिम्मत नहीं हुई। 

जब वह थोड़ा सा ज्यादा खुल गया तो एक दिन मैंने उससे उसके घर परिवार के बारे में पूछ ही लिया। 

तब उसने बताया -“सर मेरे दो बच्चे हैं । मैं उत्तराखंड से हूं घर में पत्नी है मां है।”

मेरे मन में आया इससे कहूं -“तेरे पास दो बच्चे हैं पत्नी है मां है फिर भी तू इस औरत जो तुझसे बड़ी है के लिए इतना पागल क्यों हो गया है। आखिर इसमें कौन सी खूबी है….।”

परंतु मन में उठते सवालों को मैंने मन के भीतर ही दबा लिया। इसलिए ताकि कहीं यह  नाराज न हो जाए। 

कभी-कभी सच्ची और अच्छी बातें भी आदमी को पसंद नहीं आती हैं….। क्योंकि उस समय मन की स्थिति कुछ और होती है। 

फिर मैं चाह कर भी उससे न ही कुछ  पूछ सका और न ही कोई उसे सुझाव दे सका ….।

 क्योंकि मेरा कोई हक नहीं था उसकी जिंदगी में दखल देकर कहने का कि-” तुम्हारे पास पत्नी है बच्चे हैं तो फिर यहां क्यों पड़े रहते हो आकर…। अपने घर जाओ अपनी नौकरी करो आराम से , परमात्मा का दिया तो सब कुछ है…। “

परंतु बहुत सी बातें कई बार देशकाल और परिस्थिति के अनुसार अनकही रह जाती हैं…।

कहते हैं न रंडीबाज मर्द और सूअर एक जैसे होते हैं जहां गंद मिला खाने पड़ जाते हैं….। 

जब दो महीने की छुट्टियां पड़तीं तब भी वह कभी-कभी एक डेढ़ महीना यहीं काटता..। कभी उसकी भेड़ें चराता कभी पशु चराता और कभी उसका घास ढोता…। धीरे-धीरे वह जैसे घर का खास आदमी हो गया था….। 

मैं अब जब भी उस औरत को देखता तो मुझे उससे चिढ़ होने लगती।

यही सोच करके कि यह औरत एक बसा बसाया घर उजाड़ देगी। अब कभी वह सामने आ जाती तो मैं उससे ज्यादा बात नहीं करता।

लोग उसके बारे में आपस में बातें बनाते परंतु मुंह पर किसी को कहने की हिम्मत नहीं होती। अपनी अपनी जगह सब चर्चा करते सामने चुप रहते। 

वह तो अकेली औरत थी उसे किसी सहारे की जरूरत थी। परंतु यह तो घर परिवार वाला था इसको क्या कमी थी?

लोग अपने-अपने तर्क देते परंतु पीठ के पीछे…।

बरसात के दिन थे। रिमझिम बारिश हो रही थी पहाड़ों पर धुंध पड़ी थी ।

मैंने देखा एक बूढ़ी औरत एक लंबी खूबसूरत जवान लड़की और दो बच्चे उसके आंगन में खड़े थे। 

यह बाहर के लग रहे थे । 

मैंने सुखदेव को पूछा -“विमला के आंगन में ये कौन हैं? 

यहां के तो नहीं लग रहे हैं।” 

तब सुखदेव ने बताया-“सर  यह फौजी की मां पत्नी व बच्चे हैं। 

यह छुट्टियों में घर नहीं गया तो सारा परिवार इसे ढूंढता हुआ यहां पहुंच गया है।

ये पिछले कल के आए हुए हैं।”

सचमुच आज मुझे बहुत बुरा लगा। दिल करे इस को बाजू से पड़कर परिवार के साथ भेज दूं…।

परंतु यह सब मेरे वश में तो नहीं था।

बस भीतर बहुत कुढ़न हुई। कैसे-कैसे लोग हैं दुनिया में। 

किसी का घर बसाने के लिए अपना उजड़ रहे हैं।

फिर दो-चार दिन के बाद वह परिवार के साथ चला गया। 

परंतु एक महीने बाद फिर आ गया था, ड्यूटी से सीधा घर की बजाय यहां आ जाता था। 

फिर एक दिन मेरी ट्रांसफर भी हो गई ।

मैं वापस अपने गांव आ गया। 

यह फौजी की प्रेम कहानी धीरे-धीरे ज़हन से आई गई हो गई।

लगभग बीस बरस के अंतराल के बाद मैंने एक बार फिर पहाड़ों में घूमने की सोची। 

सोचा क्यों न इस बार फिर उसी गांव में जाया जाए जहां कभी नौकरी के पांच साल काटे थे।

खैर कुछ दिनों के बाद मेरी योजना को पंख उग आए और मैंने 

वहां जाने का प्लान निर्धारित कर ही लिया ।

जून महीना था गर्मी अपने शबाब पर थी । परंतु पहाड़ों में जून में भी गर्मी का एहसास नहीं होता।

कभी-कभी थोड़ी सी बारिश लग पड़े तो रजाई लेकर सोना पड़ता है।

 जहां शहरों में ए सी भी काम नहीं आते वहां थोड़ी सी ठंडी हवा भी चल पड़े तो कंपकंपी होना शुरू हो जाती है। 

यही पहाड़ों की तासीर की खूबसूरती है। ठंडे शांत और सौम्य….।

मैंने आने से पहले अपने एक बहुत ही अजीज दोस्त को फोन कर दिया था। वह उस दिन मेरे इंतजार में घर पर ही रहा। 

शाम के समय मैं उसके पास पहुंच गया था। अब यह गांव वैसा नहीं रहा था जैसा मैं बीस वर्ष पहले छोड़कर गया था। आज यहां गांव के घर कुछ पक्के तो कुछ ही कच्चे रहे थे। आज यहां सड़क पहुंच गई थी..। समय के साथ-साथ बदलाव का दृश्य मुझे दिखाई दे रहा था।

थोड़ी देर हम उसी स्कूल के प्रांगण में पहुंच गए जहां पांच बरस गुजारे थे। वहां कुछ याद के तौर पर फोटो खींचे फिर हम उसके घर आ गए।

उसके आंगन में बैठे हुए हम यूं ही देर तक अपना सुख-दुख बांटते रहे। घर परिवार की बातें करते रहे।

लगभग बीस वर्षों के बाद का मिलन जैसे युगों बाद मिलना होता है।

धीरे-धीरे अंधेरा उतरने लगा था। 

संध्या वंदन का समय था । तभी  शंख की ध्वनि पहाड़ की नीरवता को चीरते हुए दूर-दूर तक गूंजी ।

शंख की ध्वनि सुनकर मैंने उससे पूछा ।  यहां पूजा कौन कर रहा है…?

तब उसने जो बताया मैं सुनकर स्तब्ध था।

वह बोला-“वही फौजी है जो विमला के पास होता था। विमला तो सात आठ साल पहले मर गई है। परंतु यह नौकरी छोड़कर यहीं बस गया है। 

एक आध बार घर गया था। परंतु घर परिवार ने इसको एक तरह से बेदखल कर दिया है।

अब इसके पास जाने के लिए कोई रास्ता नहीं था और न ही रहने के लिए कोई घर। 

अब तो उम्र भी ढल आई है। थोड़ी बहुत पेंशन मिलती है उसमें से कुछ पैसे यह विमला के देवर को दे देता है और उनके साथ ही रोटी खा लेता है… ।

अब इसने बड़ी-बड़ी दाढ़ी रख ली है और एक तरह से बाबा बन गया है, पूजा पाठ करता रहता है…। 

उसकी बातें सुनकर बीस साल पहले के मेरी आंखों के सामने से गुजरे वे सारे दृश्य एक बार फिर गुजरने लगे…।

और फिर मुझे सुखदेव की कही वही बात याद आ गई-भटकी हुई आत्मा..।

— अशोक दर्द

*अशोक दर्द

जन्म –तिथि - 23- 04 – 1966 माता- श्रीमती रोशनी पिता --- श्री भगत राम पत्नी –श्रीमती आशा [गृहिणी ] संतान -- पुत्री डा. शबनम ठाकुर ,पुत्र इंजि. शुभम ठाकुर शिक्षा – शास्त्री , प्रभाकर ,जे बी टी ,एम ए [हिंदी ] बी एड भाषा ज्ञान --- हिंदी ,अंग्रेजी ,संस्कृत व्यवसाय – राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में हिंदी अध्यापक जन्म-स्थान-गावं घट्ट (टप्पर) डा. शेरपुर ,तहसील डलहौज़ी जिला चम्बा (हि.प्र ] लेखन विधाएं –कविता , कहानी , व लघुकथा प्रकाशित कृतियाँ – अंजुरी भर शब्द [कविता संग्रह ] व लगभग बीस राष्ट्रिय काव्य संग्रहों में कविता लेखन | सम्पादन --- मेरे पहाड़ में [कविता संग्रह ] विद्यालय की पत्रिका बुरांस में सम्पादन सहयोग | प्रसारण ----दूरदर्शन शिमला व आकाशवाणी शिमला व धर्मशाला से रचना प्रसारण | सम्मान----- हिमाचल प्रदेश राज्य पत्रकार महासंघ द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कविता प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करने के लिए पुरस्कृत , हिमाचल प्रदेश सिमौर कला संगम द्वारा लोक साहित्य के लिए आचार्य विशिष्ठ पुरस्कार २०१४ , सामाजिक आक्रोश द्वारा आयोजित लघुकथा प्रतियोगिता में देशभक्ति लघुकथा को द्वितीय पुरस्कार | इनके आलावा कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित | अन्य ---इरावती साहित्य एवं कला मंच बनीखेत का अध्यक्ष [मंच के द्वारा कई अन्तर्राज्यीय सम्मेलनों का आयोजन | सम्प्रति पता –अशोक ‘दर्द’ प्रवास कुटीर,गावं व डाकघर-बनीखेत तह. डलहौज़ी जि. चम्बा स्थायी पता ----गाँव घट्ट डाकघर बनीखेत जिला चंबा [हिमाचल प्रदेश ] मो .09418248262 , ई मेल --- ashokdard23@gmail.com