साहित्य का नवजुगाड़वाद
साहित्य हमारा अंधेरे में है। आज के साहित्यकारों को पता नहीं है साहित्य का कौन सा वाद या युग चल रहा है। मैंने एक वाद का जन्म दिया है। यह एक ऐसा सिद्धांत है। इस सिद्धांत के बल पर आप अपनी औकात बना सकते हैं। आपके लिखे साहित्य की पहचान होगी। उसकी कीमत मिलेगी। इस सिद्धांत का नाम है–नवजुगाड़वाद।
हमारे यहाँ अधिकांश काम जुगाड़ से हो जाता है। बिना जुगाड़ लगाये आप दुनिया के सबसे पिछले पायदान पर जा सकते हैं। आपकी छवि भी धूमिल सी नजर आयेगी। आप अगर साहित्य लिख रहे हैं। आप की पहचान शून्य है। सर्वप्रथम आप संस्था जो साहित्यिक पुरस्कार या सम्मान देती है या पत्रिका में अपनी रचना छपवाना चाहते हैं तो आप को उस संस्था के मुख्य व्यक्ति से घुलना-मिलना होगा अर्थात घुलनशील होना एक अनिवार्य तत्व है।
पांव छूने की आदत डालिये। घर पर भी जाकर मेलजोल को बढ़ावा देना होगा। मुंह मिष्ठान की व्यवस्था करते ही पुरस्कार तथा सम्मान के हकदार होने की पूर्ण संभावना बन सकती है। कुछ अनुदान देने की व्यवस्था हो तो कामयाबी पहले मिलेगी। उनके परिवार के साथ घरेलू रिलेशनशिप बना सकते हैं तो जुगाड़ टेक्नोलॉजी पूरी तरह से असरदार हो जायेगी।
आप किसी विधा के माहिर खिलाड़ी हैं तो जरूर इस जुगाड़ टेक्नोलॉजी का प्रयोग कर सकते हैं। कामयाबी के नये शिखर पर पहुँच जायेंगे। आपकी प्रतिभा निखर जायेगी। आपका जलवा बनकर तैयार है। आप चाहे जितना बढिया लिख डालिये। एक प्रतिष्ठित पत्रिका नहीं छापेगी।
जुगाड़ से काम हो जायेगा। मिलनसार प्रवृत्ति का गुण होना चाहिए एक साहित्यकार के अंदर। संपादक के प्रति एकदम से सिर से पांव तक नरम हो जाइये। उनको अपनी तरफ आकर्षित करने का प्रयास करिये। आप जरूर कामयाब होंगे। तन-मन-धन एक अनिवार्य भावना होनी चाहिए।
आप अच्छा लिखते हैं। वह आपसे खराब लिखता है। वह पुरस्कार जुगाड़ से पा जायेगा। आप हाथ पर हाथ रखे सोते रह जायेंगे। आप नवजुगाड़वाद में अपना साहित्य लिख रहे हैं। आपने जुगाड़ नहीं बनाया तो आप वहीं के वहीं रह जायेंगे। कमजोर स्वयं को मत समझो। जो कुछ करना है। आपको खुद करना है। कोई आपकी मदद नही करने आयेगा। आप बनों एक संपर्कमैन। घुस जाइये अंतरात्मा तक। एक कामयाबी जरूर जुगाड़ से मिल जायेगा।
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
