तिरछी नज़र तेरी
तिरछी नज़र तेरी, बिना देखे कमाल कर गई,
उठे बिना ही बवाल पर बवाल कर गई।
लबों पे थिरकती मुस्कान, सवालों पे सवाल कर गई,
मंचलो की छोड़ो, संजीदों का भी बुरा हाल कर गई।
तिरछी नज़र तेरी… बिना देखे कमाल कर गई।
पलकों की ओट में तूने क्या राज़ छुपा लिया,
बिन बोले ही दिल ने मोहब्बत का इकरार कर लिया।
नज़र मिली भी नहीं, फिर भी दिल पे वार कर गई,
खामोशी तेरी जाने कितनी बात कर गई।
जिसे खुद पर बड़ा नाज़ था,
वो भी आज तेरे हुस्न के आगे लाचार था,
मुझे हर आहट पर सिर्फ तेरा इंतज़ार था,
तेरे मिलने के ख़याल भर से दिल मदहोश था।
तिरछी नज़र तेरी, बिना देखे कमाल कर गई,
उठे बिना ही बवाल पर बवाल कर गई।
जुल्फ़ों की घटा जब चेहरे पर उतर आई,
चाँद ने भी अपनी नज़र थोड़ी झुकाई।
तेरे गालों की लाली ने ऐसा असर कर दिया,
फूलों ने भी खिलना जैसे कम कर दिया।
तेरी चाल में जैसे कोई गीत बजता है,
तेरा हर अंदाज़ सीधे दिल में उतरता है।
तू आ जाए तो महफ़िल सँवर जाती है,
तेरे जाने के बाद भी खुशबू रह जाती है।
लबों पे थिरकती मुस्कान, सवालों पे सवाल कर गई,
मंचलो की छोड़ो, संजीदों का भी बुरा हाल कर गई।
काजल भरी आँखों में कैसी ये बात है,
दिन में भी लगता जैसे चाँदनी की रात है।
एक पल को जो पलकों ने पर्दा हटा दिया,
दिल ने उसी पल खुद को तेरे हवाले कर दिया।
तू सामने हो तो लफ़्ज़ साथ छोड़ जाते हैं,
होंठ चुप रहते हैं, नैन बोल जाते हैं।
तेरी खामोशी भी ग़ज़ल बनकर ढल गई,
मेरी हर धड़कन तेरे नाम पर मचल गई।
तिरछी नज़र तेरी, बिना देखे कमाल कर गई,
उठे बिना ही बवाल पर बवाल कर गई।
न छेड़ा कोई साज़, फिर भी संगीत हो गया,
तेरे आने से मौसम भी रंगीन हो गया।
तू हँसी तो बहारों ने पायल बजा दी,
तेरी हँसी ने मेरी दुनिया सजा दी।
तुझे देखकर ये दिल इतना समझ पाया,
इश्क़ क्या है, तू बिना कहे जता गई।
जिस बात को कहने में सदियाँ गुज़र जातीं,
तेरी एक मुस्कान वो बात बिना कहे समझा गई।
लबों पे थिरकती मुस्कान, सवालों पे सवाल कर गई,
मंचलो की छोड़ो, संजीदों का भी बुरा हाल कर गई।
अब नज़रें चुराऊँ तो भी तुझसे कहाँ बचूँ,
तू ख़्वाबों में आकर भी नींद उड़ा गई।
दिल को समझाया बहुत, दिल माना नहीं,
तेरे सिवा अब तक इसे कोई भाया नहीं।
तू मिले या न मिले, ये चाहत रहेगी,
दिल में हमेशा तेरी यादों की मोहब्बत रहेगी।
तेरी एक नज़र ने जो हाल कर दिया,
हमने उम्र भर के लिए दिल तेरे नाम कर दिया।
तिरछी नज़र तेरी, बिना देखे कमाल कर गई,
उठे बिना ही बवाल पर बवाल कर गई।
लबों पे थिरकती मुस्कान, सवालों पे सवाल कर गई,
मंचलो की छोड़ो, संजीदों का भी बुरा हाल कर गई।
— हेमंत सिंह कुशवाह
