मैं फुलवारी हूँ
मैं रंग-बिरंगी पुष्पों की फुलवारी हूँ
मैं वसुधा को बनाती सुंदर प्यारी हूँ।
मैं नीत–नीत नूतन बहार लाती हूँ
मैं प्रकृति को पुष्पों से सजाती हूँ।
मैं हवा को सुरभित कर जाती हूँ
मैं सब के तन–मन को महकाती हूँ।
मैं वृक्ष-तरुओं को रंगीला बनाती हूँ
मैं पुष्प–कली में रंग, भर जाती हूँ।
मैं भ्रमर-तितलियों, को, लुभाती हूँ
मैं ही चिड़ियों को, चह- चहाती हूँ।
मैं मधु मक्खियों को मधु चखाती हूँ
मैं ही धरा को सोलह श्रृंगार कराती हूँ।
— अशोक पटेल “आशु”
