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रास्ते अब मंजिल तक नहीं, जीवन, स्वास्थ्य और प्रकृति से भी जोड़ेंगे

रास्ते अब मंजिल तक नहीं, जीवन, स्वास्थ्य और प्रकृति से भी जोड़ेंगे। सड़कें किसी देश की केवल राहें नहीं, उसके विकास की दिशा भी बताती हैं। भारत में ये अब शहरों और बाजारों को जोड़ने वाले रास्ते भर नहीं रहीं, बल्कि बदलती विकास-दृष्टि की पहचान बन रही हैं। एनएचएआई की ‘आरोग्य वन’ पहल के तहत राजमार्गों के दोनों ओर नीम, आंवला, जामुन, इमली जैसी औषधीय वृक्ष प्रजातियाँ (और उपयुक्त स्थानों पर तुलसी, अश्वगंधा जैसी वनस्पतियाँ) कतारों में दिखें, तो यह केवल सड़क-सौंदर्य नहीं होगा। यह उस समझ का संकेत होगा कि तेज रफ्तार विकास को भी अंततः हवा, पानी और हरियाली की जरूरत है। सड़क किनारे खड़ा एक छोटा पौधा इसलिए मामूली नहीं—वह उस सोच का प्रतीक है, जिसमें विकास प्रकृति को पीछे छोड़कर नहीं, साथ लेकर आगे बढ़ना चाहता है।

इसे सिर्फ हरियाली की सरकारी कवायद मानना, इसके भीतर छिपे बड़े अर्थ को अनदेखा करना होगा। सड़क किनारे औषधीय पौधों की कतारें एक ऐसी मौन स्वास्थ्य-पट्टी बन सकती हैं, जो बिना कुछ कहे यात्री के मन तक पहुंचे। लंबी यात्रा में धूल, धुआं, शोर और तनाव के बीच तुलसी की सुगंध, नीम की छाया या आंवला-जामुन की हरियाली मन को ठहरने का अहसास दे सकती है। साथ ही, ये पौधे प्रकृति के उस पुराने ज्ञान की याद दिलाएंगे, जिसे आधुनिक जीवन सुविधा की दौड़ में पीछे छोड़ आया है। एक ओर वे कार्बन सोखकर हवा को बेहतर बनाएंगे, दूसरी ओर आयुर्वेद की परंपरा को आधुनिक राजमार्गों से जोड़ेंगे। सड़क और स्वास्थ्य का यह संगम विकास को थोड़ा और मानवीय बना सकता है।

किसी योजना की उम्र उसके उद्घाटन से नहीं, उसके निभाए जाने से तय होती है। ‘आरोग्य वन’ जैसी पहल तभी सचमुच जीवित रहेगी, जब सरकारी फाइलों से निकलकर स्थानीय समाज की जिम्मेदारी बने। राजमार्ग प्राधिकरण अकेले इसे नहीं संभाल सकता; स्थानीय समुदाय, स्वयंसेवी संस्थाएं, आयुष व वन विभाग और प्रशासन को साथ आना होगा। किसानों के लिए औषधीय पौधों की खेती अतिरिक्त आमदनी का द्वार खोल सकती है। स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों को इनके संरक्षण और पहचान से जोड़ने पर पर्यावरण शिक्षा किताबों से निकलकर मिट्टी तक पहुंचेगी। तब पौधा किसी सरकारी योजना का आंकड़ा नहीं, गांव, किसान, विद्यार्थी और यात्री—सबकी साझा जिम्मेदारी बनेगा।

बड़ी योजनाएं जमीन पर उतरने वाले कदमों से आकार लेती हैं। एनएचएआई की मौजूदा योजना में पहले चरण में टोल प्लाजा और विश्राम स्थलों के पास चुनिंदा भूखंडों पर रोपण हो रहा है। राष्ट्रीय औषधीय पौधा बोर्ड (एनएमपीबी) और आयुष मंत्रालय के अनुभव से हरियाली के साथ औषधीय संसाधन भी तैयार किए जाएं। मॉडल जोन और सेंसर-आधारित सिंचाई उपयोगी हैं, लेकिन सूखे क्षेत्रों में पानी और रखरखाव जरूरी है। स्थानीय वैद्य और आयुर्वेद विशेषज्ञ क्षेत्रानुकूल प्रजातियां तय करें। कच्चे माल को स्थानीय फार्मेसियों और आयुष केंद्रों से जोड़ा जाए। विश्राम स्थलों पर सूचना-पट्ट लगें, ताकि यात्री पौधों का औषधीय महत्व जानें। तब सड़क सफर के साथ ज्ञान का रास्ता भी बनेगी।

राजमार्गों के किनारे पड़ी जमीन विकास की उस कहानी का अनकहा हिस्सा है, जिसे अक्सर कोई पढ़ता ही नहीं। धूल, तपिश, अतिक्रमण और प्रदूषण ने इन पट्टियों को उपेक्षा का भूगोल बना दिया है। औषधीय पौधों की योजनाबद्ध कतारें इसी भूले हुए भूभाग में फिर जीवन भर सकती हैं। घनी हरियाली धूल थामने, तापमान संतुलित करने और मिट्टी बचाने में मदद करेगी। साथ ही, यही वनस्पति पक्षियों, तितलियों और छोटे जीवों के लिए छोटे-छोटे आश्रय रचेगी। तब राजमार्ग केवल पहियों का गलियारा नहीं रहेगा; वह जैव-विविधता की जीवन-पट्टी भी बन सकेगा। जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसे हरित गलियारे भविष्य की पर्यावरण नीति का अहम आधार बन सकते हैं।

हरियाली का अर्थ तब खुलता है, जब वह जीवन को छूने लगे। इस योजना का महत्वपूर्ण पक्ष स्वास्थ्य है। आधुनिक जीवन ने बीमारी का नया भूगोल रचा है—तनाव, प्रदूषण और बिगड़ती जीवनशैली उसका हिस्सा हैं। ऐसे में औषधीय वनस्पतियों को सजावटी हरियाली मानना भूल होगी। वैज्ञानिक संरक्षण, कटाई और प्रसंस्करण से इनकी सामग्री सस्ती स्वास्थ्य-उपयोगों तक पहुंच सकती है। हालांकि राजमार्ग किनारे प्रदूषण (धूल, वाहन उत्सर्जन) से औषधीय गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है, इसलिए कटाई-उपयोग से पहले वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां स्वास्थ्य सुविधाएं दूर हैं, पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय वनस्पतियां सहायक हो सकती हैं। लेकिन सावधानी जरूरी है—हर औषधीय पौधा हर व्यक्ति का उपचार नहीं। सही पहचान, वैज्ञानिक परीक्षण और विशेषज्ञ सलाह से ही इसकी संभावना जनहित में बदली जा सकती है।

हर पौधा लग जाने से हरियाली नहीं बनती; उसकी सांसें बची रहें, तभी प्रयास सार्थक है। यही इस योजना की सबसे बड़ी चुनौती है। सरकारी योजनाओं में पौधों की संख्या गिनना आसान है, उनकी जीवित रहने की दर गिनना असली प्रशासनिक कसौटी है। इसलिए सफलता का पैमाना ‘कितने पौधे लगाए’ नहीं, बल्कि ‘कितने बचे, कितने बढ़े और कितना उपयोगी हुए’ होना चाहिए। राजमार्ग प्राधिकरण, वन विभाग और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारियां स्पष्ट हों। नियमित स्वतंत्र मूल्यांकन हो और नष्ट पौधों का पुनरोपण सुनिश्चित किया जाए। स्थानीय लोगों को संरक्षण से जोड़ने के लिए पुरस्कार और प्रोत्साहन मिलें। जवाबदेही जितनी साफ होगी, योजना उतनी ही कागज से निकलकर जमीन पर जड़ पकड़ेगी।

सड़कें जब केवल दूरी नहीं, देश की सोच भी तय करने लगें, तभी विकास का अर्थ व्यापक होता है। राष्ट्रीय राजमार्गों पर औषधीय पौधों की पहल इसी बदलती सोच की अभिव्यक्ति है। राजमार्ग देश की धमनियां हैं तो उनके किनारे उगती हरियाली प्रकृति, स्वास्थ्य और समाज के बीच जीवंत सेतु बन सकती है। इसकी सफलता पौधों की संख्या या सड़क की सुंदरता में नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, किसान की आय, आयुर्वेदिक ज्ञान, जैव-विविधता और स्वास्थ्य-जागरूकता में दिखाई देगी। तब राजमार्ग केवल दूरी घटाने वाली राह नहीं रहेगा—वह देश की यात्रा में जीवन को बेहतर बनाने वाली हरित धारा बन जाएगा।

— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

प्रो. आरके जैन 'अरिजीत'

बड़वानी (मप्र)

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