कविता

राज भाषा – हिन्दी दिवस

लो आ गया राजभाषा हिन्दी दिवस
सब मिल करें हिन्दी का गुणगान
एक साथ मिलकर सब शपथ लें
दिलवाएंगे राष्ट्रभाषा का स्थान।

पूरब,पश्चिम हो या हो उत्तर,दक्षिण
हर राज्य के लोग हिन्दी समझते
शायद कुछ राजनीतिक वजहों से
बस स्वीकार करने से हिचकते ।

लगभग सत्तावन प्रतिशत जनता
हिन्दी अच्छे से बोलती- समझती
फ़िर भी न मिले राष्ट्रभाषा का दर्जा
बस यही बात थोड़ी सी अखरती ।

हिन्दी का किसी से कोई बैर नही
हर भाषा अपने आप में है पूजनीय
क्षेत्रीय भाषाएं पनपें, विकसित हों
पर हिन्दी की स्थिति न हो दयनीय।

तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम
मराठी,कोंकणी, पंजाबी खुशगवार
असमिया, बांग्ला, डोंगरी, गुजराती
ओड़िया, सिंधी , मैथिली से बहार।

अनेक भाषाओं से समृद्ध यह देश
‌मध्यस्थता के लिए अंग्रेजी चुनता
हिन्दी राष्ट्रभाषा की प्रबल दावेदार
मन की बात कोई क्यों नही सुनता।

आजादी के अस्सी वर्षों के बाद भी
भारत की न अपनी कोई राष्ट्रभाषा
क्या यह चिंतनीय विषय नही है
कर्णधारों को क्यों समझ न आता?

पाश्चात्य के प्रति हम सबका रूझान
है इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार
हिन्दी की अब भी हो रही अनदेखी
अंग्रेजी को सहर्ष कर रहे स्वीकार।

अपनी भाषाओं में काम करने में
कैसी शर्म, कुछ समझ न आए
क्यों आम जनता के मुकदमे
अंग्रेजी भाषा में लिखे व पढ़े जाएं।

गांव का बेचारा सीधा-साधा मानुष
समझ न पाए, माई लार्ड क्या बोले
वह तो बना रहता बस मूक दर्शक
न्याय के प्रति उसका विश्वास डोले।

और भी तमाम केन्द्रीय दफ्तरों में
आज भी अंग्रेजी का ही बोलबाला
भारतीय भाषाओं की होती उपेक्षा
कैसा है यह सब गड़बड़झाला ?

लो आ गया राजभाषा हिन्दी दिवस
सब मिल करें हिन्दी का गुणगान
एक साथ मिलकर सब शपथ लें
दिलवाएंगे राष्ट्रभाषा का स्थान।

— नवल अग्रवाल

*नवल किशोर अग्रवाल

इलाहाबाद बैंक से अवकाश प्राप्त पलावा, मुम्बई

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