ग़ज़ल-एक अलग कलेवर में
सुब्ह-सवेरे करते लड़ाई, जान पे मेरी आफ़त आई छोड़ दो अब तो मान लो कहना, होती न इसमें कोई भलाई सास
Read Moreसुब्ह-सवेरे करते लड़ाई, जान पे मेरी आफ़त आई छोड़ दो अब तो मान लो कहना, होती न इसमें कोई भलाई सास
Read Moreधरती से ज़रा सा ऊपर उठकर देखा तो बड़े हिस्से पर बादलों के कारण कहीं-कहीं गहरा कालापन और कहीं तेज
Read Moreमाटी से चंदन-सी ख़ुशबू हरदम आती है, देश-भक्ति के नए तराने दुनिया गाती है। सत्य, अहिंसा, न्याय, धर्म की पावन
Read Moreएक ज़माना था चिट्ठियाँ ख़ुशियों का सबब बनती थीं दुखों के पहाड़ भी टूट पड़ते थे पत्र पढ़कर संदेसा देस
Read Moreवैसे तो ज़िन्दगी हर घड़ी इक इम्तिहान है किन्तु पूर्व-नियोजित परीक्षाएँ तो कहा जाता है बचपन, जवानी की ही पहचान
Read Moreवो इक टूटा-फूटा, उजड़ा मकान है दरवाज़े हैं, खिड़कियाँ हैं,साँकल भी है पुरानी-सी बहुत-से ताले नहीं , इतने बड़े मकान में अब केवल एक ताला है फ़र्श है
Read Moreजब आँगन में मेघ निरंतर झर-झर बरस रहे हों ऐसे में दो विकल हृदय मिलने को तरस रहे हों जब
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