लेख : कथनी-करनी
एक कटाक्ष यह भी ..
यूं तो हम सब बुद्धिजीवी दूसरों को समझाने या दोष निकालने में तत्पर रहते हैं | मगर कभी जब बात अपने पर या अपनों पर आती है तो हम रस्म कहकर या परिवार वालों की खुशी के लिए उसी बात में शामिल भी हो जाते हैं |बात चाहे रस्मों रिवाज़ की हो या कोई रूढ़िवादी प्रथा की आजकल यह नारा है कि लड़का -,लड़की एक समान हैं |पर क्या हम दिल से ऐसा सोचते हैं शायद सभी नहीं !कुछ प्रतिशत लोगों को छोड़कर आज भी एक और हम लड़की बचाओ का नारा देते हैं या उसका समर्थन भी बड़ -चड़कर करते हैं ,वहीं उन्हीं समर्थन देने वालों मे से ही कईं अपनी निज़ी ज़िन्दगी में कहीं ना कहीं खुद से या अपनों से उम्मीद तो लड़के की ही करते हैं कि वही घर का चिराग है |माना सोच मे बहुत बदलाव आ रहा है मगर अभा भी बहुत कमी है |शगुन जो शादियों मे दिए जाते हैं या दहेज की ही बात कर लें एक तरफ तो हम इन सबका विरोध करते हैं मगर कितने ही ऐसे लोग हैं जो ऐसी संस्थाओं से भी जुड़े हैं मगर अपनी निजी ज़िन्दगी में उस पर खरे नहीं उतरते और कहीं ना कहीं परिवार की या रिशतेदारों की मजबूरी कहकर उसी काम को करते भी हैं जिसका वो विरोध करते हैं |बाते और भी हैं जिनमे हम जिस बात विरोध करते हैं मगर कहीं ना कहीं हम उन्हें खुद भी करते हैं या हालात से समझोता कर देते हैं |ऐसे लोग बहुत ही कम दिखते हैं जो खरा उतरते हैं और कथनी करनी एक जैसी रखते हैं |||
कामनी गुप्ता ***
aisa hi aachran karta hai ye samaaj doglepan ka .. achcha kataksh..
Thanks ji
अच्छा कटाक्ष ! लोगों की कथनी और करनी में बहुत अंतर होता है।
Thanks sirji