देश का वर्तमान
कविवर बिहारी कोई बिहार प्रांत के नहीं थे और न ही आज कोई भी उन्हें बिहार प्रांत की सीमा के मातहत बाँधने को तैयार दीखता है | वे राष्ट्र की सीमा से भी परे विश्व के उस परिकल्पना “वसुधैव कुटुम्बकम” के एक सजग और निष्पक्ष प्रहरी के रूप में मान्यता प्राप्त जनकवि और संत के रूप में विख्यात हुए |
वहीं वर्तमान में अगर कोई अपने नाम के आगे “बिहारी” लिखता है तो उसे प्रांतीय सीमा ही नहीं बल्कि जाति, धर्म और सम्प्रदाय के सीमाओं से जकड़कर देखने की एक नई प्रवृत्ति पिछले कई दशकों से विकसित हुई है | जो अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण से अधिक और कुछ भी नहीं कहा जा सकता है |
जरा देश की वर्तमान परिस्थितिजन्य घटनाओं का नब्ज टटोलें तो स्पष्ट पता चलता है कि – देश वैचारिक और राजनैतिक स्तर पर संक्रमण काल से गुजर रहा है |
आजादी के दशकों बाद बहुमत के आधार पर स्पष्टतया सत्ता परिवर्तित हुई है | यूँ तो सत्ता कई बार परिवर्तित हो चुकी है पर, किसी राजनैतिक दल या विचारधारा के आधार पर स्पष्ट बहुमत से नहीं | बल्कि मिलीजुली विचारधारा के तहत सत्ता-लोलुपता के परिणाम स्वरूप |
वर्तमान में बेशक, कुल मत-प्रतिशत के आधार पर कम प्रतिशत पानेवाली विचारधारा की ही सरकार क्यों न बनी हो | इसे लोकतान्त्रिक प्रणाली की खूबी कहें या खामी | मगर वैचारिक और राजनैतिक दृष्टि से सत्ता परिवर्तित तो हुई |
जो विचारधाराएँ जनमानस या उनके प्रतिनिधियों द्वारा अद्यतन स्वीकार किये जाते रहे चाहे लोग निराशा और उहापोह की स्थिति में ही क्यों न आत्मसात कर रहे हों | उन्हें विपरीत परिस्थितियों में वर्तमान की विचारधारा से दो-चार होने पड रहे हैं | ख़ासकर वे लोग जो सत्ता के ईर्द-गिर्द ही स्वयं को धन्यभाग और परिपोषित मानकर जीवन-यापन करते चले आ रहे थे | उन्हें, उनकी एक नशेबाज की स्थिति से अधिक कुछ भी महसूस नहीं होना लाजमी है | जैसे एक नशेबाज को नशीले सामग्री की अनुपलब्धता |
ऐसी परिस्थितियों में नशा प्राप्ति के निमित्त अपने घर के अंदर से बाहर तक अशांति और दहशत के माहौल का निर्माण भी करने से वो नहीं चूकता | ताकि उसे नशे की सामग्री उपलब्ध हो सके | लक्ष्य एकमात्र नशे की सामग्री के अलावे और कुछ भी नहीं |
शायद, आज पूरा देश ऐसी ही मानसिकता का शिकार हो रहा है या दूसरे शब्दों में शिकार बनाया जा रहा है | जिसके फलस्वरूप देश में अराजकता, द्वेष, घृणा की परिस्थितियों को अंकुरित और विकसित किये जाने की एक परम्परा सी चल पड़ी है | जिसके शिकार देश के तथाकथित प्रबुद्ध कहे जानेवाले वर्ग के साहित्यकार, इतिहासकार, संगीतकार यहाँ तक कि वैज्ञानिक भी हो रहे हैं | जिसे स्वभाविक प्रक्रिया और आत्मा की आवाज के तहत अंजाम भी दिया जा रहा है | मूल कारण केन्द्रीय सत्ता में वैचारिक परिवर्तन जो हो चुका है | जिसके प्रमाण स्वरूप देश का वर्तमान परिदृश्य दृष्टिगत है |
वर्तमान संक्रमण काल और लोकतंत्र में जनता ही मालिक की भूमिका में प्रतिष्ठित होती है | उसे ही अतिजागृत और सजग रहते हुए देश में मानवता और भविष्य निर्धारण हेतु दशा-दिशा तय करनी होगी | जबकि देश में कुनबा जनित, मौकापरस्त, सत्तालोलुपों के विचारधारायें हावी होकर देश की छवि को धूमिल कर रहे हों |
निरा-निष्पक्ष भाव से निर्णय के साथ देश में कृत्रिम रूप से नवांकुरित समस्यायों का निराकरण करने के लिए आगे आना होगा न कि संकुचित विचारधारा से बंधकर | और न ही विदेशी या पूंजीवादी लूटखोर व्यवस्था की मानसिकता से ग्रस्त समाचार माध्यमों द्वारा निर्णीत स्वार्थजन्य निर्णयों के आधार पर |
अंत में, सुनो सबकी मगर, करो अपने विवेक की | सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रहित और मानवता के हित में |
— श्याम “स्नेही”
सार्थक लेखन
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