गीतिका/ग़ज़ल

अवसाद 

ये अवसाद के काले बादल  न जाने कब छटेंगे 

आशा की स्वर्णिम धूप न‌‌ जाने कब खिलेगी ?

इन स्याह रंगों से अब जी घबराता है 

इन्द्रधनुषी रंग जीवन में न जाने कब बिखरेंगी ?

सब्र की भी अब सब्र खत्म हो चली है 

आजमाईशो के ये दौर न जाने कब थमेगी ?

इस हाल में  जीना तो मानो एक सज़ा है 

इस सजा से रिहाई न जाने कब मिलेगी ?

बड़े बेहिस है ये दुनिया वाले 

मेरी लाचारी पर न जाने कब तलक हंसेगी ?

— विभा कुमारी “नीरजा”

*विभा कुमारी 'नीरजा'

शिक्षा-हिन्दी में एम ए रुचि-पेन्टिग एवम् पाक-कला वतर्मान निवास-#४७६सेक्टर १५a नोएडा U.P