हलकान
निराशा के गहन अंधेरो में डूबता जा रहा हूंजीवन के इस पड़ाव पर शून्य होता जा रहा हूं ! कोई
Read Moreहै जीतना अगर पौरुष के अंहकार सेऐ नारी तूझे बार-बार हारना होगा खुद से ! स्वाभिमान की बड़ी कीमत होती
Read Moreमेरे आंगन में बरसने वाली बरसाते अब कहीं और बरसती हैमेरे हिस्से की शबनम अब किसी और को भिगोती है
Read Moreधार्मिक उन्माद है जोरो परमानवता की लाश पडी है सडको में ! दीमक लग रही है शिक्षा तंत्र मेंयुवा हो
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