कविता

कविता

आम

ये आम पीले-पीले
होते हैं बड़े रसीले
कोयल को ये भाते
बच्चों को ललचाते
ग्रीष्म ऋतू में पकते
अमराई निखर जाते।

केले

ये प्यारे मीठे-मीठे केले
दिखते दिखते पीले-पीले
ये बंदर को खूब ललचाते
और बच्चों के मन को भाते
ये घेर-घेर मे खूब हैं फालते
और ये कदली वन कहलाते।

नीबू

ये नीबू हैं खट्टे-खट्टे होते
जो हरे-पीले यह दिखते
ये गुणों के, भण्डार होते
और गर्मी में ठंडकता देते
ये गले को, तरावट करते
इसके शरबत सबको भाते।

— अशोक पटेल “आशु”

*अशोक पटेल 'आशु'

व्याख्याता-हिंदी मेघा धमतरी (छ ग) M-9827874578

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