सांसों से शिकवा
जब-जब घर की याद आती वह विह्वल हो वृद्धाश्रम से दूर घूमने निकल जाते थे ।
आज भी सुबह-सुबह घूमते-घूमते परमार्थ निकेतन आश्रम के बाहर एक बेंच पर बैठ, कभी स्वयं के अंदर झांकते
कभी बिल्वपत्र के पेड़ को निहारते, लगता है यह भी मेरी तरह सूख रहा है ।
उस पेड़ की तुलना स्वयं से करने लगे ।
यह पेड़ भी ना जाने कितने शिवभक्तों के मनोकामनाएं पूर्ण करने में सहायक बना होगा । इसकी हर डाली कांटों से भरी है,फिर भी शिवार्पण के लिये एक-एक पत्ता भक्त गण तोड़ते होंगे कभी यह प्रतिकार में अगर कांटे चुभाये भी होंगे तो लोग यही कहते होंगे
“बेलपत्र तोड़ने में कांटे तो चुभेंगे ही,कांटों के डर से भक्ति करना कैसे छोड़ें ?”
उसने भी तो अपनें बच्चों को कभी निर्मोही पिता बन, कभी प्यार से भी पैसे का महत्व समझाते थे ।
शायद इसी वजह से सभी बच्चे उसे आश्रम भेज कर सारी सुविधाओं के बदले आश्रम को अनुदान देकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं ।
काश पत्नी की बातों को दिल पर लेने के बजाय दिल से सोचते तो शायद आज भी भरे-पूरे परिवार में अपने नाती-पोतों के साथ फिर से बचपन जीते ।
पछतावे में दो बुंद आंसू लुढ़क कर गालों पर रेंगने लगे।
मुंह से अस्फुट स्वर निकले–
“ बुढ़ापे में ही क्यों स्पष्ट निर्णय क्षमता आती है जवानी में क्यों बड़े-बुजुर्गों की बात नसीहत लगती है ?”
इस क्यों के साथ ही सांसें चलती रहेंगी । अब किससे शिकवा-गिला ।
— आरती राय
