लघुकथा – प्रथम गुरू
पिछले कुछ दिनों से आशा फोन पर बहुत कम ही बात करती थी। कारण स्पष्ट था, ए आई के आने
Read Moreपिछले कुछ दिनों से आशा फोन पर बहुत कम ही बात करती थी। कारण स्पष्ट था, ए आई के आने
Read Moreचिंतन से चित्त हो अशांतमन रहने लगे क्लांतएकाकीपन रास आने लगेरातें लंबी हो डराने लगेहर आहट पर मन घबराने लगेकुंठा
Read Moreजेब में चंद रूपये और जरूरतें सुरसा की तरह मुंह बाये उसे कसौटी पर कसने को तैयार थी । राजन
Read More“पापा इस बार मैं घर नहीं आ पाऊँगा गर्मी की छुट्टीयों में,क्योंकि अपने लिए एक फ्लैट लेने की सोच रहा
Read Moreसमय कितना बदल रहा है ! पहले माता पिता शादियां तय करते थे फिर संतान के मोह में लिव-इन रिलेशनशिप
Read Moreनित्य नवीन सपने और उन्हें पूरा करने का जुनून ! जीवन से धीरे-धीरे सब कुछ छीन लिया । अहसास होने
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