चाहतें
ये चाहतों के सिलसिले
कभी शिकवे कभी गिले
धूँध से हैं जा कर मिले
छंटते नहीं कभी भी शाम ढ़ले ।
अपेक्षाओं की कोख से पैदा होते
उम्मीदों के दीप अखंड ही रहते
छोटे-छोटे सपने पूरे होते रहते
फिर भी निराशाओं के बादल घेरे रहते।
स्वस्थ तन में बिमारियों का बसेरा
क्रोध-लोभ और दुश्चिंताओं का घेरा
मानव मन है एक घुड़सवार
संतोषधन त्याग रहे सदा बीमार ।
कर्म की राह पर चलते जाना
अपने हिस्से का फर्ज निभाना
संयमित जीवन सद्व्यवहार
वैसे मानव नहीं कभी लाचार ।
— आरती रॉय
