कविता

कविता

बचपन की अरुणिम किरणों का
साथ लिए,
मुस्कुराते हुए जीवन
आगे बढ़ता है।
स्मृतियों के नन्हे कण भी,
दूर क्षितिज पर
चमकते प्रतीत होते हैं।
यौवन की सरिता भी बहकर
निकल जाती है,
पीछे यादों की छाया छोड़कर।
और जब स्वयं वृद्ध हो जाते हैं,
तब स्नेह से अपने हाथ आगे बढ़ाते हैं।

— अमन्दा

एस. अमन्दा सरत्चन्द्र

श्री लंका

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