कहानी

नुक्ताचीनी

(1)
मुरलीधर रिक्शा से उतरे। मालती को भी उतरने का संकेत किया।
“यह फलों की टोकरी कहाँ रख दूँ बाबू जी!” रिक्शावाले ने सिर पर उठाई टोकरी के भार से दब जाने जैसा अभिनय किया।
“अंदर ले आओ तनिक, बैठक में रखवा दो।” मुरलीधर निर्देश दे लोहे के गेट की ओर मुड़ गया। उस पर लगी साँकल को सलाखों के अंदर हाथ डालकर खोला तो पहले रिक्शावाला अंदर घुसा। उसके पीछे-पीछे मालती व मुरलीधर घुसे। रिक्शेवाला अपने पैसे लेकर चला गया तो मुरलीधर ने पुन: गेट की साँकल लगा दी।
“विनय! ये फल तो इंद्रा बहन के पास रखवा देना ज़रा।” मुरलीधर ने बैठक से ही आवाज़ लगाई।
“जी, मामा जी! आया अभी।” अंदर से आधी शेव किए एक युवक बाहर आ गया।
“सीधा इंद्रा के पास ही भिजवा देना। इसमें तीज का सिंधारा है, शृंगार का सारा सामान है।” मुरलीधर ने हिदायत दी।
“हाँ मामाजी! मम्मी के पास उनके कमरे में ही रख दूँगा। पर आप इतना क्यों कष्ट उठाते हैं? मम्मी कोई आज की ब्याही तो हैं नहीं। 40 साल हो गए, कब तक आप ये मायके का धर्म निभाते रहेंगे। आपकी अपनी बेटियाँ भी हैं।” तौलिए से चेहरे को साफ़ करता हुआ विनय बोला।
“बहन-बेटी को देने से कोई कमी थोड़े ही आती है। अब माति-बाबूजी रहे नहीं तो क्या! इंद्रा को भी तो लगना चाहिए कि उसका मायका खत्म नहीं हुआ है।” मुरलीधर टोकरी का सामान विनय को संभलवाते हुए बोले। “चलो, इंद्रा के पास ही बैठते हैं।” बैठक में बैठती मालती को उठने का इशारा कर मुरलीधर कमरे से पीछे की ओर आँगन में निकल गए।
“तुम चलो, मैं आती हूँ।” मालती ने उठने का उपक्रम किया और पुन: सोफ़े में धँस गई।
बैठक के बाहर बरामदे में आने पर बाएँ हाथ पर रसोई और दाएँ हाथ पर दो कमरे बने थे। पहले कमरा विनय और पत्नी संध्या का था। दूसरे कमरे में इंद्राणी का पलंग एक कोने में बिछा था।
“राम राम मुरली भैया! तीज ले आए हो?” इंद्राणी जैसे अंतर्यामी थी। भाई का आना भी उसने जान लिया था।
“राम राम इंद्रा! हाँ, लाया हूँ। … जीजाजी का पलंग कहाँ गया यहाँ से?” कमरे में केवल एक ही पलंग देखकर मुरलीधर ने आश्चर्य प्रकट किया।
“उनकी तबीयत ठीक नहीं है। रात-रात भर खाँसते रहते हैं तो बोल रहे थे कि इंद्रा! तेरी नींद खराब न हो तो मैं बरामदे में अपना पलंग लगा लेता हूँ। ठंड में बैठक में सो जाऊँगा। अभी तो बाहर भी मौसम अच्छा ही है। है न भैया! एक पल को मेरे बिना नहीं रहते। कितना ख्याल रखते हैं मेरा …पर कहना नहीं मानते। फ़्रिज से निकालकर सीधा ठंडा पानी गट-गट पीते हैं। गला तो खराब होना ही था। डॉक्टर के भी नहीं जाते हैं कितना ही कह लिया।” इंद्राणी लेटे-लेटे ही रेलगाड़ी के डिब्बों की माफ़िक एक के बाद एक बोलती रही।
“पर हैं कहाँ जीजाजी!” मुरलीधर ने चारों ओर नज़रें घुमाईं।
“बाहर घूमने गए हैं। प्रात:कालीन भ्रमण पर दुनिया को लैक्चर जो पिलाते हैं न! मुझे बोलकर ही घर से निकले थे सुबह।” बिना गर्दन हिलाए वह कहती रही।
इंद्राणी मुरलीधर के साथ आए सामान को पारखी नज़रों से ताकने लगी।
“अभी तक? अब तो साढ़े ग्यारह बज रहे हैं।” इंद्राणी को सामान दिखाते हुए मुरलीधर के हाथ रुक गए।
“आ जाएँगे। कहाँ जाएँगे? बैठ गए होंगे यार-दोस्तों के बीच। पार्क में ही होंगे। दिनभर मुझे पचास हिदायतें दिए बिना कहाँ चैन आएगा उन्हें।” इंद्राणी का सूखा हुआ मुखड़ा भी मुस्कुराहट से फैल गया था।
“हाँ, ठीक भी है रिटायर आदमी दिनभर करे भी तो क्या करे।” मुरलीधर ने हाँ में हाँ मिलाई।
“भैया, मिठाई क्या लाए हो तीज की? आटे के गोंद वाले लड्डू?” खोजी निगाहों से टोकरी का अन्वेषण करते हुए वह बोली।
“घेवर-फ़ैनी लाया हूँ। मावे वाला घेवर है। तुझे पसंद है न?” मुरलीधर ने ध्यान भटकाना चाहा।
“और देशी घी के गोंद वाले लड्डू? नहीं लाए?” इंद्राणी के दिमाग की सुई उसकी ज़बान में ही अटकी थी। अन्य वस्तुओं में उसने कोई दिलचस्पी न दिखाई।
“अगली बार ले आऊँगा। तू चिंता मत कर। जीजाजी को बाहर ही सोने दियो, ज़िद मत करियो।” मुरलीधर ने समझाया। एक निगाह हाथघड़ी पर डाली। काँटे से काँटा टकराकर दोपहर के बारह बजने का उद्घोष कर रहा था।
“तुम तो पिछली बार कह गए थे कि अगली बार दो कनस्तर लाऊँगा। यह पिछला कनस्तर बिल्कुल खाली हो गया। एक लड्डू भी नहीं है।” वह स्टूल पर रखे कनस्तर की ओर पुतलियाँ कर बोली।
“ले आऊँगा इंद्रा! बोला तो…। थोड़ा तो सब्र रख।” मुरलीधर घड़ी से ध्यान हटाते हुए बोले।
“भैया, पिछली बार भी कनस्तर आधा ही भरा हुआ था। पूरा भरवाकर लाना आगे से।” उसने फिर दोहराया।
मुरलीधर ने ‘हाँ’ में सिर हिलाया और दरवाज़े की ओर देखा कि कहीं मालती आ रही हो तो अपनी ननद रानी की फ़रमाइश सुन ले और उसे इन ताने-उलाहनों के जंजाल से बचा ले। उसके मिजाज के कारण उसे अपनी बहन से क्या-क्या सुनना पड़ता है। पर वह जानता था इस सड़ांध से भरे कमरे में वह कदम भी न रखेगी।
“हुँह! कनस्तर भरकर लड्डू! बहनजी न तो अपनी उम्र देखती हैं, न बीमारी और न ही लाचारी। सारा दिन बिस्तर में पड़े-पड़े बस हुकुम चलाना जानती हैं।” कमरे के बाहर नर्म धूप सेंकती, बरामदे में पड़ी बेंच पर बैठी हुई मालती बड़बड़ाई।
“मुरली भैया! पिछली बार गोंद कम भुना था लड्डुओं में, और बादाम-काजू भी कम थे। किशमिश ही किशमिश भरी हुई थी। भाभी से कहना कि आटे में थोड़ा बेसन भी मिला लें भूनते वक्त, इससे स्वाद बढ़ जाएगा। खूब घी में भून के थोड़ी सूजी और डाल लें तो लड्डुओं में कुरकुरापन आ जाएगा। … भैया, चीनी भी कम ही थी। कहना, हर लड्डू के हिसाब से नुक्ताभर चीनी और मिला लें।”
इंद्राणी का समीक्षा पुराण खुल गया था। इतनी मीमांसा तो ग्रंथों की भी न हुई होगी जो लड्डुओं की हो रही थी। जब अन्य अवयव काम करना बंद कर दें तो जिह्वा सारी ताकत का उपयोग कर डालती है। मुरलीधर ने बाहर तक नज़र दौड़ाई कि कहीं मालती ने सुन न लिया हो। नहीं तो वह भी सुना-सुनाकर ही मार डालेगी।
“लो, हो गई नुक्ताचीनी शुरु। यहाँ तो इनके बाप के नौकर लग रहे हैं न! एक ये हैं कि हर हफ़्ते अपनी प्यारी बहन से मिले बिना रोटी नहीं पचती और मेरी पिलाई पक्की। चक्की में पीस रखा है हरदम। बस, यही बदा है भाग्य में।” मालती बड़बड़ाई और हिकारत से कमरे की ओर देखा और फिर अपनी नाक पर साड़ी का पल्लू रख लिया। यह नेत्र रूपी इंद्री बड़ी बलशाली होती है, अपने साथ नासिका के तंतुओं को भी चलायमान कर देती है।
“मामी जी, अब तो लकवा बाएँ हिस्से से दाएँ पर भी फैलता जा रहा है। बिल्कुल हाथ-पैर भी नहीं हिला पाती हैं। बाई के लिए नहलाना-धुलाना भी मुश्किल हो रहा है।” नाश्ते की ट्रे लेकर रसोई से बाहर आती हुई संध्या बोली।
“जबान तो खूब चलती है, जीभ लपाके ले रही है। गोंद भी कम बता रही हैं। मेरे हाथ टूट गए आटा भूनते-भूनते, एक किलो बादाम डल गए और एक किलो काजू, वो भी तल के… और इन्हें नुक्तों की कमियाँ नज़र आ रहीं हैं। …. मुर्गी जान से गई, खाने वाले को मज़ा ही न आया।” चाय का कप उठाते हुए मालती बोली।
“आप क्यों बुरा मानती हो, मामी जी! पता तो है आपको उनकी आदत का। आपके हाथ के लड्डू वे बड़े चाव से खाती हैं। कोई कमी नहीं बताती खाते हुए। मामा जी के आने की राह देखती रहती हैं।” कमरे में मुरलीधर को चाय का कप देकर आते हुए संध्या बोली।
“बहन जी की आदत का भी पता है और बहन जी के लाडले भाई की आदत का भी।” सिर पर पल्लू को पुन: जमाते हुए मालती बोली, “लगता है जीजाजी भी पाँच-पाँच घंटे का पार्क-भ्रमण इसी कारण करते हैं कि जितना कम झेलना पड़े, उतना अच्छा है। कहाँ तक रहे कोई इस नरक में।”
दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ीं और पकड़े जाने के डर से तुरंत ही मुखमुद्रा कठोर बना ली।
“वैसे आज तो कुछ ज़्यादा ही देर हो गई पिताजी को। इतनी देर तो कभी नहीं लगाते।” संध्या दीवार घड़ी को देखते हुए बोली।
“आ जाएँगे। कहाँ जाएँगे!” कहते हुए मुरलीधर भी निकल आए और मालती को लेकर घर चले गए।
(2)
अगले सप्ताह रविवार के दिन, बहन इंद्राणी के द्वारे, मुरलीधर रिक्शा से उतरे और रिक्शाचालक को कनस्तर भीतर तक रखने का आदेश दिया।
वह अहसानमंद था मालती का कि इस बार उसने हलवाई बुलवाकर अपने निर्देशन में दो कनस्तर भरकर लड्डू स्वयं ही तैयार करवा दिए थे। हमेशा की तरह वह इस अब की बार ज़रा भी चिड़चिड़ाई न थी। ये स्त्रियाँ भी अजीब होती हैं। पल में तोला, पल में माशा। इनका कुछ पता ही नहीं चलता। उसने तो डर के मारे मुँह ही न खोला था और दो कनस्तर पूरे-पूरे भरकर लड्डू बनवा लिए गए थे। बल्कि कुछ अधिक ही। दो-दो किलो दोनों बेटियों के लिए भी डिब्बे भरवा लिए थे मालती ने।
“विनय! जीजाजी का कुछ पता चला, कहाँ चले गए?” घर में घुसते ही मुरलीधर ने पूछा।
“जैसा आपने कहा मामाजी, पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवा आया था अगले ही दिन। उनकी पार्क वाली मित्र-मंडली में हरेक के घर हो आया। वे उस दिन पार्क से समय से उठ गए थे, पर घर नहीं पहुँचे।” विनय एक लम्बी आह भरता हुआ बोला।
“पुलिस को कुछ मिला अब तक?” कहते हुए मुरलीधर का स्वर काँप गया। किसी अनजान आशंका से उनका कलेजा बैठा जा रहा था। पूछते भी न बन रहा था और बिना पूछे भी न रहा जा रहा था।
“मैंने बिजली के दफ्तर, जल निगम में, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, ऑटो स्टैंड, पनवाड़ी के, टेलर के; हर जगह पता किया कि कहीं किसी काम से गए हों और किसी ने उन्हें देखा हो पर मजाल है जो उस दिन किसी ने उन्हें देखा हो। कोई सिरा हाथ नहीं लग रहा।” वह अखबार की तह बनाने लगा था।
“ओह! …और टेलीफ़ोन विभाग में? वे एक तार फ़ोन की खिंचवाने को बोल रहे थे न? या गैस वाले के?” मुरलीधर ने और स्थान सुझाए।
“वहाँ भी उनका फ़ोटो दिखाकर पूछ आया हूँ। अब तक तो शहर का कोना-कोना छान मारा है मैंने।” अखबार मेज पर पटकता हुआ विनय बोला।
“इंद्राणी कैसी है? वह जानती है क्या?” मुरलीधर को सहसा ख्याल आया।
“नहीं, माँ को कुछ नहीं बताया है और संध्या को भी मना किया है। कह दिया है कि पापा चार तीर्थ के दर्शन को गए हैं। कुछ दिन में लौटेंगे।” विजयी मुस्कान के साथ उसने कहा।
“चल अच्छा है जो उसे नहीं पता। डॉक्टर पहले ही कह रहा था कि कोई भी मानसिक झटका उसे कोमा में ले जा सकता है या पागल कर सकता है।” मुरलीधर ने राहत की साँस ली।
“हाँ, वे तो बस लड्डू खाती हैं और आपकी राह देखती हैं। एक भी उनमें से कोई और हाथ तो लगा देखे, खा जाती हैं उसे ही। वैसे तो उनके कमरे में रखी चीज़ों को हाथ लगाने का भी जी नहीं करता, मुँह में तो कौन रखे।” कहते ही अपनी जिह्वा को अपने दाँतों से काटा उसने, फिर आगे बोला, “शरीर से अपना सत्त अब बिल्कुल ही छोड़ रही हैं। टट्टी-पेशाब की भी नहीं बतातीं, कपड़ों में ही कर लेती हैं। बाई भी छोड़ के भाग जाती है। उसे भी मना-मुनुकर, बहला-फ़ुसलाकर लाना पड़ता है।”
विनय की झल्लाहट लाख छुपाने से भी प्रकट हो रही थी। आँगन में होते हुए और संध्या को एक कप चाय का आदेश देते हुए वे मुस्कुराते हुए इंद्रा के कमरे में पहुँचे। वे उस कमरे में पहुँचकर चाय का घूँट कैसे हलक से नीचे उतार लेते हैं, मालती भी हैरत मानती थी।
“इंद्रा! ओ इंद्रा! कैसी है तू?” मुरलीधर ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा।
“राम राम मुरली भैया! पंखा चला दोगे क्या? मक्खियाँ बहुत परेशान कर रही हैं। वे तो कछुआ छाप जला देते थे।” इंद्रा कराहते हुए बोली।
मुरलीधर ने महसूस किया कि इंद्रा की आवाज़ में वह रौब न था जो नुक्ताचीनी में हुआ करता था। मुरलीधर ने पंखा चलाया और मच्छर-अगरबत्ती भी जला दी।
“देख तेरी भाभी ने अब की दो कनस्तर लड्डू भेजे हैं। बिल्कुल वैसे ही बनवाए हैं मैंने, जैसा तू कह रही थी। गोंद को देशी घी में भुनवाया है, बादाम ज़्यादा डलवाए हैं, सूजी और बेसन भी डलवाया है।” मुरलीधर को पूरी आस्था थी कि इस बार इंद्राणी का चेहरा लड्डुओं के वर्णन से फूल-सा खिल जाएगा।
मुरलीधर चहकते हुए बोल रहे थे। कमरे में से आती बदबू का भभका इस बार उनसे बर्दाश्त न हुआ और वे इंद्रा के सिरहाने से दूर हट गए। उनकी नज़र पड़ी कि जीजाजी का पलंग पुन: उसी कमरे में रखा है और उस पर सामान का ढेर लगा हुआ है। तीज के सिंधारे का सारा सामान भी उसी पर धरा हुआ है।
“भैया! मुझे पंडित ने बताया था कि मैं सुहागिन ही मरूँगी। सच तो कहा था न उसने?” वह धीमे से निरीह-सी वाणी में बोली।
“हाँ-हाँ, क्यों नहीं। …ले, तू लड्डू खा। देख कैसे कुरकुरे बने हैं अबकी बार, मुँह में रखते ही स्वाद आ जाएगा।” वे कनस्तर में से एक लड्डू निकाल दिखाने लगे।
“भैया! तुम मेरा एक काम कर दोगे?” वह अनदेखा कर बोली।
“हाँ इंद्रा! तू कह तो! तेरा सब काम करता तो हूँ। तू फिर भी ऐसे पूछ रही है।” मुरलीधर ने झूठ-मूठ की नाराज़गी दिखानी चाही।
“भैया, विनय के बाबूजी को ढूँढ लाओ कहीं से।” इंद्राणी बोली।
“अरे! तू चिंता मत कर। वे आ जाएँगे कुछ दिनों में, तीर्थ यात्रा को गए हैं। …तू लड्डू खा न, चीनी तो मालती ने खुद तोल-तोलकर ज़रा इक्कीस ही डाली है। बल्कि शक्कर डाली है गुड़ की और थोड़ा खजूर भी मिलाया है। तेरी शुगर न बढ़ जाए न, उसका भी ध्यान रखा है।” अपनी बढ़ती धड़कनों को शांत करता हुआ मुरलीधर का स्वर आया।
“भैया, इन्हें ले आओगे न? वे आ जाएँगे न?” इंद्राणी का स्वर अनुनय कर रहा था।
“तीर्थ तो कर लेने दे। आ जाएँगे खुद ही।” मुरलीधर ने दिलासा दिया।
“भैया, उन्हें ढूँढने जाओगे न! खाओ मेरे सर की कसम।” वह गिड़गिड़ाने लगी।
मुरलीधर का हाथ उसके सिर पर पहुँचा और आँखें भर आईं।

— डॉ. आरती ‘लोकेश’

डॉ. आरती ‘लोकेश’

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