कलैंडर
जब भी मौका मिलता है वह चुपके से मेरे आस-पास आकर कुछ अपनी कह कुछ मेरी सुन समीक्षक बन जाता है । ऐसा लगता मानों वह शीघ्र ही मुझसे बिछड़ जायेगा । उसकी बेचैनी समझ कर भी नासमझी का ढोंग करना पड़ता है । पूस की सर्द रातों में भी वह बेचैनी से करवटें बदलता है।
मुझसे रहा नहीं गया पूछ बैठी– “क्यों इतने व्यग्र होकर करवटें बदलते हो ?”
उसके आंखों से शीत सी सर्द आंसुओं की धार बह चली । मैं उसके कंधे पर हाथ रख बोली– “सुनो वक्त का तकाजा है, बयोबृद्ध और जाते हुए वक्त को कोई लाख चाहे, संभाल नहीं सकता । यादों में तुम सदैव रहोगे यह मेरे दिल के सिवा कोई नहीं जानता। एक सीख देकर जा रहे हो । जब भी तर्क और कुतर्क के बीच जंग छिड़े,मौन को मेहमान बना लो वह तेरा साथ तुझे संभालने तक निभायेगा ।”
दीवार पर तुम बालपन में ही टंग जाते हो, अपना अस्तित्व खोने से पहले एक निशान छोड़ जाते हो । बिना शिकवे-गिले अपना स्वस्थान अपने बंधु को दे जाते हो । कलैंडर हो वक्त के साथ बदलाव सहजता से स्वीकार कर इतिहास बन जाते हो ।
— आरती रॉय
