प्रकृति प्रकोप
अतृप्त धरा अति अकुलाईवर्षा रूठ नभ में खिसियाईफूलों की डाली मुरझाईपौधों ने भी शोक मनाई । क्यों रूठी हो धरा
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Read Moreप्रशांत के आने की खुशी में हरि काका दो दिनों से लड्डू बांट रहे थे । सात वर्ष बाद प्रशांत
Read Moreशब्द क्यों खोने लगे हैंसोच कर हैरान हूँ ।चिंतन को वक्त नहींफिर भी परेशान हूँ।एक आदत सी हो गई हैबेवजह
Read Moreऊंची-ऊंची इमारतें खूबसूरत बालकनी एवं उच्च मध्यम वर्गीय परिवारों का रहन-सहन सब कुछ कल्पना जी को सपना सा प्रतीत हो
Read Moreबृद्धाश्रम में महफिल जमी हुई थी । इधर उधर की बातें हो रही थी । उन सब में एक वसुधा
Read Moreअक्सर स्वयं में खो जाते हैं पूरे वर्ष की विशेष घटना याद आते हैं कभी बच्चों की चिंता कभी परिवार
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