कविता
तेरे खेल निरालेआनंद उत्साह और अवसादसब कुछ तेरे हवालेमन मर्जी चलती कहांअदृश्य शक्तिविचरण करते यहां-वहांतुम हमें संभालतेअहंकार को ग्रास बनातेस्वाभिमान
Read Moreभावनाएं आवारा बादल की तरहउमड़-घुमड़ कर शोर मचायेकभी ठंढ़ी फुहार बन हलचल मचायेकभी गर्जन कर हमें डरायेऐसी सोच पर हंसी
Read Moreअतृप्त धरा अति अकुलाईवर्षा रूठ नभ में खिसियाईफूलों की डाली मुरझाईपौधों ने भी शोक मनाई । क्यों रूठी हो धरा
Read Moreप्रशांत के आने की खुशी में हरि काका दो दिनों से लड्डू बांट रहे थे । सात वर्ष बाद प्रशांत
Read Moreशब्द क्यों खोने लगे हैंसोच कर हैरान हूँ ।चिंतन को वक्त नहींफिर भी परेशान हूँ।एक आदत सी हो गई हैबेवजह
Read Moreऊंची-ऊंची इमारतें खूबसूरत बालकनी एवं उच्च मध्यम वर्गीय परिवारों का रहन-सहन सब कुछ कल्पना जी को सपना सा प्रतीत हो
Read Moreबृद्धाश्रम में महफिल जमी हुई थी । इधर उधर की बातें हो रही थी । उन सब में एक वसुधा
Read More