लघुकथा – प्रथम गुरू
पिछले कुछ दिनों से आशा फोन पर बहुत कम ही बात करती थी। कारण स्पष्ट था, ए आई के आने के बाद जब भी फोन करती यही कहती–
“माँ पता नहीं किस दिन नौकरी चली जायेगी, हमारी जिंदगी तो किश्तों पर ही टिकी है । होम लोन, कार लोन, एवं इंश्योरेंस पॉलिसी सभी के किश्त चुकाने के बाद घर खर्च चल जाता है यही बड़ी बात है ।”
यह सब सुन कर वह नि:शब्द हो जाती, दिन-रात मंथन करने के बाद आज उसने आशा को एक खत लिखा-
“मेरी प्यारी आशा,
सुख सौभाग्य बना रहे । बेटी जिंदगी में अक्सर ऐसे मुकाम आते हैं जब मानव हार जाता है, सदियों से ऋषि-मुनियों के शोध कार्यों पर वैज्ञानिकों ने कार्य करते हुए नित-नए तकनीक को सजाया और संवारा है।
ए आई भी मानव हित में मानव निर्मित तकनीक ही है ।
ज्वार-भाटा हर वक्त समंदर में भुचाल नहीं लाता है, समस्याएं आयेंगी पर जीत सदैव मानव-मष्तिस्क की ही होती है।
आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। नवीन का सदैव स्वागत करो, समाधान स्वविवेक से ही संभव है ।
माँ अपने बच्चों को हारते या टूटते हुए नहीं देख सकती है। हार कर जीतना, मुश्किल है, परंतु जीत के लिए प्रयत्नशील रहना सहज है, सहजता से सफलतापूर्वक जीना ही जीवन है ।
हार में भी जीत का द्वार खुला रहता है। सदैव याद रखना । माँ अपने बच्चों को धन-दौलत तो नहीं दे सकती पर माँ ही बच्चों को कठिन से कठिन परिस्थितियों में संयमित रह कर हार कर भी जीतने के लिए प्रेरित कर सकती है ।
दुनिया की हर माँ ज्ञानी नहीं होती, परंतु फिर भी अपने बच्चों की पहली गुरू होती है ।
—– तुम्हारी माँ
— आरती रॉय
