कविता
तेरे खेल निराले
आनंद उत्साह और अवसाद
सब कुछ तेरे हवाले
मन मर्जी चलती कहां
अदृश्य शक्ति
विचरण करते यहां-वहां
तुम हमें संभालते
अहंकार को ग्रास बनाते
स्वाभिमान का पाठ पढ़ाते
निर्बल नहीं मानव तन
अक्सर ऐसे भाव जगाते ।
व्रत-उपवास और पूजा-पाठ से
संयम का तुम पाठ पढाते ।
तृष्णा लुप्त हो रही
तृप्ति संगिनी बन रही
अमुल्य धन है संतोष धन
स्थिर हो जाये जब चंचल मन ।
— आरती रॉय
