लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 12)
भरत जी ने एक दिन पूर्व ही अपने कुशल कर्मचारियों को भेजकर मार्ग की बाधाओं (गड्ढों, झाडियों, पत्थरों आदि) को दूर करा दिया था, जिससे उनके रथ उस मार्ग पर सरलता और वेग से चल रहे थे। उनके साथ घोड़े जुते हुए रथों पर सवार उनके मंत्री और पुरोहित चल रहे थे। तीनों रानियाँ भी अपने-अपने रथों में बैठकर श्री राम के दर्शनों को जा रही थीं। उनके पीछे अवध की सेना थी, जिसमें हाथीसवार और घुड़सवारों के साथ-साथ पैदल सैनिक भी थे।
उनके पीछे अयोध्या के वे नागरिक थे, जिनके पास अपने वाहन (रथ, घोड़े, हाथी, बेलगाडी आदि) थे। उन नागरिकों में सभी व्यवसायों और वर्गों के लोग थे, जैसे- स्वर्णकार, लोहार, कुम्भकार, धोबी, बढ़ई, गन्धी, बुनकर, दर्जी, वैद्य, नट, केवट, ब्राह्मण, वणिक आदि। सबके वेश सुन्दर थे और पवित्र वस्त्र धारण किये हुए थे। वे सभी बहुत उत्साह के साथ आपस में बातें करते हुए श्री राम को वन से लौटा लाने का निश्चय करके जा रहे थे और अपने भाग्य को सराह रहे थे।
भरत जी अपने यात्रा दल के साथ अयोध्या से प्रातःकाल ही चल दिये थे और मार्ग भी बहुत सरल बन गया था, जिससे रथ तेजी के साथ चले जा रहे थे। इसलिए दो घड़ी बाद ही वे दोपहर होने के बहुत पहले ही तमसा नदी के तट पर पहुँच गये। उस समय नदी में अधिक पानी नहीं था, इसलिए सभी वाहन उसे बिना किसी पुल के सरलता से पार करके आगे चल दिये। अब वे सीधे दक्षिण दिशा में गंगा तट पर बसे शृंगवेरपुर की ओर बढ़ रहे थे। उनको श्रीराम की तरह एक रात्रि तमसा नदी के किनारे बिताने के लिए बाध्य नहीं होना पड़ा।
इस प्रकार बहुत दूर तक मार्ग तय कर लेने के बाद वे उसी दिन सायंकाल होने से पूर्व ही शृंगवेरपुर में गंगा जी के तट पर पहुँच गये। उस समय तक सभी लोगों को थकान हो गयी थी, इसलिए सभी विश्राम के इच्छुक थे। सबने गंगा जी के दर्शन किये और उनको प्रणाम किया।
गंगा तट पर पहुँचकर भरत जी ने अपने मंत्रियों से कहा- “आप सभी लोगों को उनकी इच्छा के अनुसार यहाँ ठहरा दीजिए। आज रात्रि में विश्राम कर लेने के बाद कल प्रातः हम सभी गंगा जी को पार करके आगे चलेंगे। मेरे यहाँ ठहरने का एक उद्देश्य यह भी है कि मैं गंगा जी में उतरकर पिताजी को जलांजलि देना चाहता हूँ।” यह आदेश पाकर मंत्रियों ने उनकी आज्ञा के अनुसार सभी को भिन्न-भिन्न स्थानों पर शिविर लगाकर ठहरा दिया। फिर भरत जी ने भी वहीं विश्राम किया।
शृंगवेरपुर में निषादों के राजा गुह अपने बंधु-बांधवों के साथ रहा करते थे। उनका राज्य अयोध्या की सीमा से लगा हुआ था और वे अयोध्या नरेश के मित्र थे। उनकी शिक्षा भी गुरु वशिष्ठ जी के आश्रम में हुई थी। उनके गुप्तचरों ने उनको पहले ही सूचित कर दिया था कि अयोध्या की ओर से एक दल सेना के साथ शृंगवेरपुर की ओर बढ़ रहा है, जिसका नेतृत्व राजकुमार भरत कर रहे हैं। यह सूचना पाकर वे चिन्तित हो गये। उनको अयोध्या की ओर से किसी के आने की कोई सूचना नहीं मिली थी। यह अवध के महामंत्री सुमन्त्र जी की ओर से की गयी भूल थी कि उन्होंने भरत जी के आने की कोई पूर्व सूचना उनको नहीं भेजी। शायद उन्हें भरत जी को यह बताने का समय ही नहीं मिला था कि श्री राम के मित्र निषादराज गुह शृंगवेरपुर में रहते हैं, अन्यथा वे पूर्व सूचना अवश्य देते।
इससे निषादराज गुह के मन में शंका पैदा हुई। उन्होंने यह सोचा कि भरत जी पहले यहाँ हमें समाप्त करेंगे, फिर श्री राम को मारकर अपना राज्य सुरक्षित करने जायेंगे। इस स्थिति से निपटने के लिए उन्होंने अपने सलाहकारों की बैठक बुलायी। बैठक में उन्होंने सभी को अयोध्या से भरत जी के सेना सहित आने का समाचार दिया और अपनी शंका उनके सामने रखी। अधिकांश लोगों ने उनकी शंका को सही बताया, क्योंकि यदि भरत जी का उद्देश्य अनुचित न होता, तो उन्होंने अपने आने की पूर्व सूचना अवश्य दी होती। इसलिए सबने निश्चय किया कि हम भरत जी को गंगा नदी पार नहीं करने देंगे, चाहे हमें इसके लिए अपने प्राण ही क्यों न देने पड़ें।
यह निश्चय कर लेने के बाद निषादराज गुह ने अपने सैनिकों को धनुष-बाण, तलवार आदि युद्ध सामग्री से सुसज्जित करके गंगा तट पर उचित स्थानों पर नियुक्त कर दिया। लेकिन उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि जब तक मेरी ओर से स्पष्ट आदेश न मिले, तब तक कोई बल प्रयोग न किया जाये, क्योंकि वे पहले भरत जी के मन की थाह लेना चाहते थे।
सायंकाल से पूर्व ही निषादराज गुह को पता चल गया कि भरत जी की विशाल सेना गंगा तट पर ठहरी है, इसलिए वे अपने कुछ मंत्रियों के साथ भरत जी के मन की टोह लेने के लिए कुछ भेंट लेकर उनसे मिलने गये। उन्होंने अपने आने की सूचना अवध के महामंत्री सुमन्त्र जी के पास भेज दी।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण शु. 10, सं. 2082 वि. (3 अगस्त, 2025)
