कवितापद्य साहित्य

माँ

मेरी मॉ
मॉ की ममता है निराली
याद भी आज बहुत सताई
याद है वो दिन बचपन का
जब गोदो मे बैठाती थी
बालों को सहलाती थी
माथा को थपथपाती थी
लोरी खुू सुनाती थी
उनके स्नेहमयी ऑचल में
स्वर्ग का सुख मै पाती थी
दुख दर्द मे भी रहने पर
थोडी भी न घबराती थी
खुद अपने कष्टो को सहकर
सुख की छाया वो भरती थी
अब कहॉ गया वो दिन
देखते ही कुछ पलो मे
ये अंजाना सी डगर मै
किस तरह मौ सुलझाउ
फिर भी तेरे ख्वाबो में
हर क्षण क्षण मै बिताती हूँ
बस बात यही है मॉ मेरी ,कि
तुम याद बहुत ही आती हो|
विजया लक्ष्मी

बिजया लक्ष्मी

बिजया लक्ष्मी (स्नातकोत्तर छात्रा) पता -चेनारी रोहतास सासाराम बिहार।

One thought on “माँ

  • दुनीआं में सब से ऊंची माँ ही होती है ,मैं बूडा हो कर भी याद करता हूँ .

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