कविता

कविता : रोशनी

जब सूरज अपने उजास को
समेट रहा होगा
और चाँद ने फैलानी
शुरू कर दी होगी चाँदनी
दोनों के मिलन से उभर
आता है सिंदूरी रंग
तुम वहां से एक चुटकी
सिंदूर लेकर मेरी
मांग में लगा देना
खिलती चाँदनी के
एक सितारे को मेरे
माथे पर सजा देना
फिर दुआओं का चुम्बन हो
मेरी दोनों पलकों पर
और मैं खुद को डूबो दूँ
चाँद की चाँदनी में
की मैं अब एक
रोशनी गढ़ना चाहती हूँ
तुम्हारे नाम की
हमारे प्रेम के नाम पर

रीना मौर्य "मुस्कान"

शिक्षिका मुंबई महाराष्ट्र ईमेल - mauryareena72@gmail.com ब्लॉग - mauryareena.blogspot.com

11 thoughts on “कविता : रोशनी

  • राज किशोर मिश्र 'राज'

    लाजवाब

    • रीना मौर्य "मुस्कान"

      bahut-bahut dhanywad

  • बहुत खूब .

    • रीना मौर्य "मुस्कान"

      bahut-bahut dhanywad .

  • डॉ शुभ्रता मिश्रा

    सुंदर रचना

    • रीना मौर्य "मुस्कान"

      hardik aabhar

  • ओमप्रकाश क्षत्रिय "प्रकाश"

    सुन्दर कविता .

    • रीना मौर्य "मुस्कान"

      hardik aabhar.

      • ओमप्रकाश क्षत्रिय "प्रकाश"

        स्वागत है आप का आदरनीय रीना मौर्य जी

    • रीना मौर्य "मुस्कान"

      bahut- bahut dhanywad

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