स्वार्थ रहित संबंध ही, मुझको हैं मंज़ूर
धन-दौलत के मोह से, रहता मैं हूँ दूर।
प्रेम भरा व्यवहार ही, मुझको है मंज़ूर॥
धन से ऊँचा मान है, ऊँचा सच्चा नेह।
प्रेम जहाँ सम्मान हो, महके घर और गेह॥
मीठे बोलों से सजे, जीवन का दस्तूर।
धन के आगे बिक गए, उनसे रहना दूर।
स्वार्थ रहित संबंध ही, मुझको हैं मंज़ूर।
प्रेम भरा व्यवहार ही, मुझको है मंज़ूर॥
मतलब के रिश्ते सभी, टिकते कुछ ही काल।
संकट आए सामने, बदलें अपनी चाल॥
सुख-दुख में जो साथ दे, वह सच्चा है नूर।
मतलब के इंसान से, रहे सदा ही दूर।
सच्चे रिश्तों का सदा, मुझको है गुरूर॥
धन-दौलत के मोह से, रहता मैं हूँ दूर॥
झूठी शान दिखा सके, धन का क्षणिक प्रभाव।
सच्चे मन का प्रेम ही, देता शीतल छाँव॥
दया, धर्म, विश्वास से, खिलता जीवन-नूर।
धन के बल पर जो चढ़े, गिरते चकनाचूर।
सच्चाई का साथ ही, मुझको है मंजदूर।
धन-दौलत के मोह से, रहता मैं हूँ दूर॥
रिश्तों की पूँजी सदा, स्नेह भरा सम्मान।
यही मनुष्यत्व का रहे, सबसे बड़ा प्रमाण॥
प्रेम बाँटता जो सदा, वही हुआ भरपूर।
धन के पीछे जो बिके, उनसे रहना दूर।
प्रेम भरा व्यवहार ही, मुझको है मंज़ूर।
धन-दौलत के मोह से, रहता मैं हूँ दूर॥
— डॉ. सत्यवान सौरभ
