क्या? समाज संवेदनहीनता की ओर बढ़ रहा हैं?
समाज की पहचान उसकी ऊँची इमारतों, चौड़ी सड़कों, बढ़ती अर्थव्यवस्था या आधुनिक तकनीक से नहीं होती। किसी भी सभ्यता का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से किया जाता है कि वह अपने बुज़ुर्गों, अपने माता-पिता और अपने रिश्तों के साथ कैसा व्यवहार करती है। जब कोई पिता, जिसने पूरी उम्र अपने बच्चों के लिए संघर्ष किया, अपनी अंतिम यात्रा में अपनी ही संतान की प्रतीक्षा करता रह जाए, तब यह केवल एक परिवार का दुःख नहीं रहता; यह पूरे समाज की संवेदनहीनता का दस्तावेज़ बन जाता है।
हाल में सामने आई घटना, जिसमें एक वृद्ध पिता ने वृद्धाश्रम में अंतिम सांस ली और उनकी बेटियाँ अंतिम संस्कार में उपस्थित नहीं हुईं, बल्कि किसी ने पैसे भेजे और किसी ने वीडियो कॉल पर अंतिम संस्कार देखने की बात कही – यह समाचार पढ़कर मन अंदर तक विचलित हो जाता है। यह दृश्य केवल एक व्यक्ति की मृत्यु का नहीं, बल्कि रिश्तों की मरती हुई आत्मा का प्रतीक प्रतीत होता है।
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ हर सुविधा हमारी मुट्ठी में है। एक क्लिक पर पैसा भेजा जा सकता है, वीडियो कॉल की जा सकती है, दुनिया के किसी भी कोने से जुड़ा जा सकता है। लेकिन विडंबना देखिए कि तकनीक ने दूरी तो घटा दी, पर दिलों के बीच की दूरियाँ बढ़ा दीं। आज बच्चों के पास माता-पिता के लिए महँगे उपहार हैं, लेकिन उनके साथ बैठने के लिए कुछ घंटे नहीं हैं। बैंक खाते भर गए हैं, लेकिन घरों के आँगन खाली हो गए हैं।
एक पिता अपने बच्चों के लिए क्या नहीं करता? वह अपनी इच्छाओं का गला घोंट देता है ताकि बच्चों के सपनों को पंख मिल सकें। वह अपनी भूख छिपाकर बच्चों का पेट भरता है। अपनी थकान छिपाकर उनके भविष्य की नींव रखता है। वह अपने जीवन का हर संघर्ष इस विश्वास के साथ करता है कि बुढ़ापे में उसके अपने ही उसके साथ खड़े होंगे। लेकिन यदि वही संतान अंतिम समय में केवल ऑनलाइन पैसे भेजकर अपना दायित्व पूरा समझने लगे, तो इससे अधिक पीड़ादायक विडंबना क्या हो सकती है?
यहाँ यह भी स्वीकार करना आवश्यक है कि किसी भी घटना के पीछे ऐसे कारण हो सकते हैं जो सार्वजनिक रूप से ज्ञात न हों। पारिवारिक संबंध जटिल हो सकते हैं, परिस्थितियाँ अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए किसी समाचार के आधार पर किसी व्यक्ति या परिवार का अंतिम नैतिक निर्णय देना उचित नहीं होगा। लेकिन इस घटना ने जिस सामाजिक प्रश्न को जन्म दिया है, वह अत्यंत गंभीर है – क्या हम धीरे-धीरे रिश्तों को भावनाओं से नहीं, बल्कि लेन-देन से मापने लगे हैं?
आज की शिक्षा हमें सफल पेशेवर तो बना रही है, लेकिन क्या वह हमें अच्छा बेटा, अच्छी बेटी और अच्छा इंसान भी बना रही है? डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन संस्कार सिकुड़ते जा रहे हैं। करियर की ऊँचाइयाँ छूने की दौड़ में परिवार पीछे छूट रहा है। माता-पिता अब जीवन के केंद्र में नहीं, बल्कि “समय मिलने पर याद करने योग्य” सूची में शामिल होते जा रहे हैं।
वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या भी इसी बदलते समाज की कहानी कहती है। कभी वृद्धाश्रम उन लोगों के लिए होते थे जिनका इस दुनिया में कोई नहीं होता था। आज वहाँ ऐसे माता-पिता भी पहुँच रहे हैं जिनके बच्चे प्रतिष्ठित नौकरियों में हैं, विदेशों में रहते हैं, आर्थिक रूप से सम्पन्न हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि गरीबी बढ़ी है; इसका अर्थ यह है कि भावनात्मक गरीबी बढ़ी है।
हम यह भी भूलते जा रहे हैं कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने घर में देखते हैं। यदि आज कोई अपनी वृद्ध माँ या पिता की उपेक्षा करता है, तो वह अनजाने में अपनी अगली पीढ़ी को भी यही पाठ पढ़ा रहा है। समय का चक्र बड़ा न्यायप्रिय होता है। जो व्यवहार हम अपने माता-पिता के साथ करते हैं, वही किसी न किसी रूप में हमारे सामने लौटकर आता है।
भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है। यह केवल धार्मिक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का गहरा दर्शन है। माता-पिता के प्रति सम्मान केवल उनके जीवित रहने तक सीमित नहीं होता; उनकी अंतिम यात्रा में कंधा देना भी हमारी संस्कृति में सबसे बड़ा पुत्रधर्म और पुत्रीधर्म माना गया है। अंतिम संस्कार केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि जीवनभर के ऋण के प्रति कृतज्ञता का अंतिम प्रणाम है। इसे किसी वीडियो कॉल या ऑनलाइन भुगतान से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता।
यहाँ हम किसी एक परिवार की आलोचना करने के लिए नहीं कह रहें बल्कि यह पूरे समाज को आईना दिखाने का प्रयास है। हमें स्वयं से पूछना चाहिए—क्या हम भी कहीं अपने माता-पिता को केवल आर्थिक सहायता देकर अपने दायित्व की इतिश्री तो नहीं मान बैठे? क्या हमने कभी उनके साथ बैठकर बिना किसी स्वार्थ के समय बिताया? क्या हमने उनके अकेलेपन को समझने का प्रयास किया?
जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि धन, पद, प्रतिष्ठा और सफलता सब यहीं रह जाते हैं। अंत में याद रहती है तो केवल इंसानियत और रिश्तों की गर्माहट। जिस दिन माता-पिता इस दुनिया से विदा हो जाते हैं, उस दिन पछतावे के आँसू उन्हें वापस नहीं ला सकते। इसलिए जब तक वे हमारे बीच हैं, उनके साथ समय बिताइए, उनका सम्मान कीजिए, उनकी बातें सुनिए और उन्हें यह एहसास कराइए कि वे अकेले नहीं हैं।
क्योंकि जिस दिन किसी पिता की चिता के सामने उसकी संतान की जगह केवल मोबाइल की स्क्रीन दिखाई देने लगेगी, उस दिन यह समझ लेना चाहिए कि तकनीक जीत गई है, लेकिन इंसान हार गया है। विकास की चमक ने संवेदनाओं की लौ को ढक दिया है, और यदि हमने समय रहते इसे नहीं संभाला, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें आधुनिक तो कहेंगी, लेकिन मानवीय नहीं।
हमें यह ध्यान रखना होगा कि माता-पिता को जीवन भर आपके पैसों की नहीं, आपकी उपस्थिति की आवश्यकता होती है। उनकी अंतिम यात्रा में दो कदम साथ चलना किसी पर — उपकार नहीं, बल्कि उस ऋण का छोटा-सा प्रतिदान है जिसे कोई संतान जीवन भर भी नहीं चुका सकती।
— संजय एम तराणेकर
