अधूरी ख़्वाहिश
चाँद आधा ठहरा,
खिड़की पर रात जागे,
मन कुछ कहता है।
सूनी-सी राहें,
पदचिह्न कहीं खो गए,
सपना अधूरा।
बुझते दीपक में,
अब भी लौ बाकी है,
आशा साँस लेती।
जो पास न आया,
उसकी यादों की खुशबू,
हवा में ठहरी।
एक ख़त अधूरा,
शब्दों में मौन बसा है,
आँखें पढ़ती हैं।
सूना आँगन है,
पायल की धुन खो गई,
साँझ उदास है।
टूटा-सा सपना,
तकिए पर चुपचाप पड़ा,
नींद नहीं आती।
वक़्त गुजरता है,
पर कुछ पल ठहर जाते,
दिल में हमेशा।
अधूरी ख़्वाहिश,
शायद फिर जन्म लेगी,
नई सुबह में।
— डॉ. अशोक
