कविता

मेरे कृष्ण, मेरी दृष्टि में

विधा- कविता
शीर्षक- मेरे कृष्ण, मेरी दृष्टि में

मेरे कृष्ण केवल मंदिरों में विराजमान,
एक आराध्य नहीं, मेरे जीवन की दृष्टि हैं,
मेरे कृष्ण मेरे प्रेम भी हैं, मेरी गीता भी हैं
मेरी नीति भी हैं और मेरी गीता भी हैं।

जब भी जीवन के रास्ते उलझते हैं,
रास्ते सुझाते, उलझनें सुलझाते हैं,
उलझनें वंदन बन जातीं, चंदन बन जातीं
मन की दुविधा में साथ निभाते हैं।

कृष्ण प्रेम का सबसे सुंदर स्वरूप हैं,
स्नेह की छांव, समर्पण की धूप हैं,
राधा के प्रति प्रेम हो या सुदामा की मिताई,
हर रूप में मेरे कृष्ण अप्रतिम-अनूप हैं।

कृष्ण बाँसुरी बजाते हैं, सुदर्शन चक्र भी चलाते,
धर्म की रक्षा के लिए बुद्धि-धैर्य-साहस दिखाते,
कर्तव्य के मार्ग पर अडिगता उनकी नीति है,
कर्म करते रहना, फल की चिंता न करना सिखाते।
स्वरचित और मौलिक
लीला तिवानी
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

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