मेरी रचना
मैं यही चाहता हूँ
मेरी रचनाओं में
सहजता बनी रहे
किसी घमंड से युक्त न हो
एक सादगी लपेटे रहे
किसी पुरस्कार की
कोई आशा न रखे
मेरी रचना
किसी श्रृंगार से सुसज्जित न हो
दिखावे से दूर रहे
राजसिंहासन की भी
उम्मीद नहीं करती है मेरी लेखनी
किसी के हक को भी
नहीं छीनना चाहती है
नई नवेली दुल्हन की तरह
कोई चमकीला वस्त्र
नहीं पहनना चाहती है
किसी सेज को
रंगीन नहीं करना चाहती है
गहनों का हार भी
आकर्षित नहीं कर सकता है
झूठे शब्दों से भी
लदी नहीं होती है
चापलूसी से कोसों दूर
आम लोगों के दिलों में
निवास करती है
यही सब खास है
मेरी रचनाओं में
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
