कहानी – मृगतृष्णा
रात के 2 बज चुके थे। अनाया अपने कमरे की खिड़की के पास बैठी, बाहर पसरे स्याह अंधेरे को निहार रही थी। शहर की सड़कें सुनसान पड़ चुकी थीं, बस दूर कहीं किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़ हवा में तैर रही थी। यह वही वक्त था जब स्मृतियाँ अपने सबसे क्रूर रूप में लौटती हैं, जब दिन भर की भागदौड़ थम जाती है और मन के भीतर दबे हुए सारे किस्से जाग उठते हैं। अनाया ने कई बार कोशिश की थी कि इस घड़ी को नींद में बिता दे, पर आज भी उसकी आँखों में नींद का नामोनिशान नहीं था।
पिछले कुछ महीनों से यही सिलसिला चला आ रहा था। उसकी शादी को अभी मुश्किल से चार महीने बीते थे, और इस दौरान न जाने कितनी ऐसी रातें गुज़री थीं, जब फोन की घंटी अचानक सन्नाटे को चीर देती। अनाया ने खुद को कई बार समझाया था कि अब इन फोन कॉलों का कोई मतलब नहीं रह गया, कि हर बार उठकर वही घाव फिर से हरा हो जाता है, फिर भी जब भी फोन बजता, उसका हाथ अपने आप स्क्रीन की ओर बढ़ जाता। शायद यही वह कमज़ोरी थी, जिसे न वह पहचान पाई थी, न कभी उससे लड़ पाई थी।
तभी उसके फोन की स्क्रीन रोशन हुई। कॉलर आईडी पर कोई नाम नहीं था, केवल एक अनजाना क्रमांक चमक रहा था, लेकिन धड़कनों की बढ़ती रफ़्तार ने बता दिया था कि उस पार कौन है। बरसों बीत जाने के बावजूद उसका दिल आज भी उस आवाज़ को पहचानने में एक पल भी नहीं लगाता था। हाथ काँपने लगे, फिर भी उसने खुद को समेटा और स्क्रीन को छू लिया।
उसने फोन उठाया और बिना किसी औपचारिकता के एक रूखे स्वर में कहा, “कैसी है तू?” यह उनका सालों पुराना संवाद था, जो कभी अपनेपन की निशानी हुआ करता था, पर आज के संदर्भ में एक चुभती हुई विडंबना बन चुका था। कभी यही शब्द दोनों के बीच की गर्माहट को जताते थे, अब वे केवल उस दूरी का प्रमाण थे जो हालात ने उनके बीच खींच दी थी।
दूसरी तरफ कुछ पलों की एक भारी, दमसाधने वाली खामोशी रही। फोन लाइन में केवल हल्की-सी सरसराहट सुनाई दे रही थी, मानो कोई अपने भीतर के तूफान को शांत करने की कोशिश कर रहा हो। फिर एक परिचित, लेकिन थकी हुई आवाज़ उभरी, “शादी हो चुकी है… मेरी शादी हो चुकी है। कुछ बोलना है तो बोल, नहीं तो फोन कट कर दे। वैसे भी बहुत रात हो रही है।” आवाज़ में एक बनावटी सख्ती थी, जो दरअसल अंदर की टूट-फूट को छिपाने की नाकाम कोशिश भर थी। हर शब्द के पीछे एक ऐसी थकान छिपी थी, जिसे बरसों की खामोशी ने और गहरा कर दिया था।
अनाया की आँखें छलक आईं, लेकिन उसने अपने वजूद को समेटते हुए कहा, “बोल।” उसकी आवाज़ में भी वही ठहराव लाने की कोशिश थी, जो सामने वाले ने ओढ़ रखी थी। दोनों जानते थे कि यह ठहराव केवल एक आवरण है, भीतर तो सब कुछ बिखरा हुआ है।
“अनाया?” इस बार आवाज़ में वह दरार थी, जिसने सारी बनावटी दीवारें ढहा दीं। नाम पुकारते ही जैसे बरसों का बोझ एक साथ उतर आया हो।
“हाँ बोल ना, क्या हुआ?” अनाया का संयम अब जवाब दे रहा था। उसकी उंगलियाँ अनजाने में फोन को कसकर पकड़ चुकी थीं, मानो वह इस आवाज़ को कहीं फिसल जाने से रोकना चाहती हो।
“अनाया, मुझे नींद नहीं आती यार।” उस एक वाक्य में जैसे पूरी दुनिया की थकान, एक गहरी रिक्तता और बेबसी छुपी थी। जो व्यक्ति दिन के उजाले में एक परिपूर्ण वैवाहिक जीवन का अभिनय कर रहा था, वह रात के एकांत में अपनी हकीकत से हार चुका था। दिन भर हँसते हुए चेहरे के पीछे जो थकान जमा होती थी, वह रात होते ही बाँध तोड़कर बह निकलती थी।
“क्यों?” अनाया ने अपने छलकते आँसुओं को रोकते हुए पूछा। यह सवाल पूछते हुए भी वह जानती थी कि जवाब पहले से उसे मालूम है, फिर भी उसे सामने वाले के मुँह से सुनना था।
“मुझे नींद नहीं आती जब तक मैं तेरे मुँह से यह ना सुन लूँ… कि बेहद मोहब्बत करती हूँ मैं तुमसे। मुझे कभी छोड़ना मत। दुनिया हो तुम मेरी।” यह वाक्य कोई नई बात नहीं था, यह बरसों से चली आ रही उस अनकही रस्म का हिस्सा था, जिसे दोनों बिना कहे भी समझती थीं। पर आज इन शब्दों में एक अजीब-सी लाचारी घुली हुई थी, मानो कह रहा हो कि हालात कुछ भी हों, भीतर का यह हिस्सा कभी नहीं बदलेगा।
फोन लाइन के दोनों तरफ अब सिर्फ खामोशी और रुंधे हुए गलों से निकलती भारी सांसों की आवाज़ थी। समाज की रीतियों, खोखले आदर्शों और रिश्तों की औपचारिक बंदिशों ने उन्हें शारीरिक रूप से तो अलग कर दिया था, लेकिन रूह के धागे अब भी उसी शिद्दत से उलझे हुए थे। कभी दोनों ने साथ बैठकर भविष्य के जो सपने बुने थे, वे अब केवल स्मृतियों की परछाइयाँ भर रह गए थे, फिर भी उन परछाइयों की गर्माहट पूरी तरह फीकी नहीं पड़ी थी। अनाया भली-भांति जानती थी कि यह रिश्ता अब एक अंतहीन मृगतृष्णा से ज्यादा कुछ नहीं, फिर भी हर बार जब फोन बजता, उसका मन उसी मृगतृष्णा की ओर खिंचा चला जाता।
उसने खिड़की के बाहर देखा। सड़क किनारे लगे पुराने पेड़ की डालियाँ हवा में हल्के-हल्के हिल रही थीं, जैसे वे भी इस बातचीत की गवाह बनना चाहती हों। उसे याद आया, बरसों पहले इसी तरह की एक रात, जब दोनों छत पर बैठकर तारे गिना करती थीं और आने वाले कल की योजनाएँ बनाया करती थीं। तब उन्हें नहीं मालूम था कि वक़्त उनके रास्ते इस तरह अलग कर देगा। परिवार की मर्ज़ी, समाज की उम्मीदें और दुनिया की नज़रें, सबने मिलकर उस रिश्ते को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया था, जहाँ से लौटना अब मुमकिन नहीं रहा था।
लेकिन उस सर्द रात में, उस एक कमज़ोर पल के लिए, उसने यथार्थ की सारी कड़वाहट को किनारे रख दिया। उसने अपनी आँखें बंद कीं और एक गहरी साँस लेते हुए धीरे से वे अल्फाज़ दोहरा दिए जो उस बेचैन रूह के लिए किसी मरहम की तरह थे, “बेहद मोहब्बत करती हूँ मैं तुमसे। कभी नहीं छोड़ूँगी तुम्हें। दुनिया हो तुम मेरी।” शब्द कहते हुए उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर उसने उसे रोका नहीं। यह महज़ एक खोखला दिलासा नहीं था, बल्कि दो टूटे हुए दिलों का वह शाश्वत सच था, जो केवल रात के अंधेरे में अपनी पनाह खोज पाता था।
दूसरी तरफ से एक लंबी, राहत भरी सांस सुनाई दी। मानो बरसों से रुकी हुई कोई साँस आखिरकार बाहर निकली हो। “अच्छा, अब सो जा। सुबह फिर वही दुनिया बुला रही होगी,” उसने धीमे स्वर में कहा, जैसे इस एक पल की सच्चाई को हमेशा के लिए अपने भीतर समेट लेना चाहती हो।
“तू भी सो जा। अपना ध्यान रखना,” अनाया ने कहा, यह जानते हुए भी कि यह विदाई अस्थायी है, कि अगली किसी सुनसान रात में फिर वही अनजाना क्रमांक स्क्रीन पर चमकेगा और वही पुरानी रस्म दोहराई जाएगी।
फोन कट गया। कमरे में फिर से केवल दीवार घड़ी की टिक-टिक बची रह गई। अनाया देर तक खिड़की के पास बैठी रही, आसमान में बिखरे तारों को देखती हुई, यह सोचते हुए कि प्रेम हमेशा मिलन का नाम नहीं होता। कभी-कभी यह दूर रहकर भी किसी की बेचैन रातों की इकलौती नींद बन जाने की मूक तपस्या है, एक ऐसा रिश्ता जो न पूरी तरह जी पाता है, न पूरी तरह मर पाता है, बस हर रात के सन्नाटे में चुपचाप साँस लेता रहता है।
खिड़की के बाहर पूरब की ओर आसमान का रंग हल्का-हल्का बदलने लगा था। रात अपने आखिरी पहर में पहुँच चुकी थी, पर अनाया की आँखों में अब भी वही जागरण था, जो बरसों से उसकी रातों का साथी बन चुका था। उसने फोन को धीरे से तकिए के पास रख दिया और आँखें मूँद लीं, यह जानते हुए कि नींद फिर भी नहीं आएगी। उसके मन में बार-बार वही आवाज़ गूंज रही थी, वही थकी हुई, टूटी हुई आवाज़, जो हर रात किसी और के जीवन में मुस्कुराते हुए दिन बिताती थी और रात होते ही उसी पुराने सहारे की तलाश में लौट आती थी।
उसने सोचा, शायद यही उन दोनों की नियति बन चुकी थी, एक ऐसा रिश्ता जिसे न कोई नाम दिया जा सकता था, न कोई ठिकाना। समाज की नज़रों में यह कहानी बरसों पहले खत्म हो चुकी थी, पर दिलों के किसी कोने में यह अब भी उतनी ही जीवित थी, जितनी उस पहली मुलाकात के दिन थी। कभी-कभी अनाया को लगता, काश वह इस डोर को पूरी तरह काट सके, पर अगले ही पल उसे यह भी समझ आ जाता कि यही डोर उन दोनों के टूटे हुए वजूद को किसी तरह जोड़े रखने का इकलौता सहारा है।
पूरब का आसमान अब हल्के नारंगी रंग में रंगने लगा था। एक नया दिन दस्तक दे रहा था, वही दिन जिसमें वह फिर एक बार अपनी हँसी के पीछे अपनी रातों की सच्चाई छिपाएगी, और अनाया फिर एक बार अपने रोज़मर्रा के जीवन में लौट जाएगी, इस उम्मीद के साथ कि शायद अगली रात उतनी भारी न हो। पर दोनों जानते थे कि जब भी रात के 2 बजेंगे, फोन फिर बजेगा, और वे फिर एक बार उन्हीं पुराने अल्फाज़ों में अपनी अधूरी दुनिया को जी लेंगे।
— महेन्द्र तिवारी
