मुक्तक/दोहा

खोया मन का गाँव

चेहरे पर मुस्कान है, मन में भरा विकार।
मीठी बोली बोलकर, करते तीर प्रहार॥

कुर्सी पाकर भूलते, कल तक का व्यवहार।
पद की माया देखिए, बदल गया संसार॥

सच की राह कठिन बहुत, झूठ सजा दरबार।
जिसकी जितनी तेज है, उसकी उतनी धार॥

मंचों पर उपदेश हैं, गलियों में अँधियार।
कथनी ऊँची हो गयी, करनी है लाचार॥

मुँह पर मीठे शब्द हैं, मन में खिंची लकीर।
अपने ही अपनों यहाँ, बन बैठे शमशीर॥

धन के आगे कट गए, आज समय के हाथ।
योग्यता चुपचाप है, अवसर धन के साथ॥

कागज पर संसार है, आँकड़ों में विकास।
सूखी आँखें पूछतीं, कब बदलेगी आस॥

न्यायालय तक पहुँचने, वर्षों लगते आज।
न्याय मिले जब देर से, कैसा फिर वह राज॥

बाजारों की भीड़ में, खोया मन का गाँव।
अपने घर में अजनबी, खोज रहे हैं ठाँव॥

मोबाइल की रोशनी, करती मन पर वार।
पास खड़े रिश्ते सभी, फिर भी दूर अपार॥

नदियाँ सूखी, खेत सूने, प्यासा है संसार।
फिर भी जल के नाम पर, होते रोज विचार॥

जाति-धर्म की आग में, जलता अपना गाँव।
रोटी माँगे पेट तो, मिलता केवल दाँव॥

भीड़ बहुत बाजार में, तनहा हर इंसान।
ऊँची-ऊँची बात है, छोटा होता मान॥

नेता बदले रोज ही, बदले उनके बोल।
जनता फिर भी ढो रही, आशाओं की ढोल॥

सत्य-सदाचार बचें, बच जाए संसार।
मनुष्य अगर मनुष्य हो, मिट जाए अँधियार॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh

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