दोहा छंद
दूर्वा श्री गणेश को, माँ दुर्गा श्रृंगार।
भोग लगाओ प्रेम, होगा जन उद्धार।।
सभी निभाते भूमिका, जैसा बुद्धि विवेक।
सबके अपने रंग हैं, भले विवेक अनेक।।
सबकी अपनी भूमिका, सबका अपना सार।
कम लोगों को ही मिले, सार्थकता विस्तार।।
कुछ लोगों की भूमिका, देती है दुख घोर।
सबसे ज्यादा नाचते,बने हुए जो मोर।।
अपना कोई अब नहीं, देने वाला भाव।
बिना दाम के जेब का, टीस रहा है घाव।।
बेगाने ही बन रहे, बगलगीर तो आज।
दुनिया के दस्तूर का, उल्टा दिखे समाज।।
अपने भारत वर्ष का, बढ़ा विश्व में मान।
उनको मिर्ची लग रही, जो जनमे नादान।।
आजादी के पर्व का, बना रहे उत्साह।
बिना किसी मतभेद के,सबको हो परवाह।।
आज तिरंगा विश्व को, देता है विश्वास।
हम सबको भी गर्व है, बढ़ती दिखती आस।।
हम सबका कर्तव्य है, हो शहीद का मान।
किसी तरह से हो नहीं, कैसे भी अपमान।।
सीमा पर सैनिक खड़ा, भूला घर परिवार।
धरती माता का सदा, उसका पहला अधिकार।।
राहत देती सरकार जो, उसमें होता खेल।
कुछ की दौड़े रेल तो, कुछ का निकले तेल।।
कुछ लोगों को आ रहा, आफत में आनंद।
क्योंकि उनकी सोच में, जहर भरा छलछंद।।
नभ में ध्वज लहरा रहा, आजादी के नाम।
करते हैं जन-मन सभी, हर्षोल्लास प्रणाम।।
जो जितना स्वाधीन है उतना ही लाचार।
उसके हिस्से आ रहा, केवल चिंता सार।।
आती है जब भी प्रलय, देती गहरे घाव।
चलती बिन पतवार के, दुखियारों की नाव।।
बलिदानी जो दे गए, आजादी उपहार।
जिम्मेदारी हम आप की, समझें इसका सार।।
बलिदानी देकर गए, खुली हवा उपहार।।
उनके सपने पूर्ण हों, तब होगा उद्धार।।
बोल बड़े अनमोल हैं, कहते अच्छे लोग।
कुछ लोगों को लग रहा, सबसे भारी रोग।।
मान रहे हम आप भी, बोल बड़े अनमोल।
मगर नहीं हैं चाहते, बोलें मिश्री घोल।।
गुरु चरणों में कीजिए,निज का अर्पण आप।
रोग-शोक चिंता सहित, दूर रहेगा पाप।।
पहले अर्पण ईश को, फिर करिए हर काम।
मिले सफलता आपको, संग नया आयाम।।
सिर्फ हथेली में नहीं, लिखे ईश तकदीर।
निज कर्मों से खींचिए, अपनी नई लकीर।।
नहीं हथेली हाथ में, क्या वे भाग्य विहीन।
उनसे ज्यादा लग रहे, आप हमें हो दीन।।
आप हथेली हाथ में, महज एक है अंग।
आप सँवारो कर्म से, विविध भाग्य के रंग।।
विलय पूर्व कर लीजिए, सारी बातें साफ।
वरना निश्चित मानिए, हो जाओगे हाफ।।
अब रिश्तों में आ गया, आज विलय का रोग।
स्वार्थ सिद्ध जैसे हुआ, कहते सब संयोग।।
माँ के आँचल से बड़ा, नहीं और सुखसार।
ईश्वर भी है चाहता, मिले हमें भी प्यार।।
मिलता है जो सुख हमें, ममता आँचल नित्य।
जीवन का सबसे बड़ा, मान रहे आदित्य।।
हर सूरत जैसा दिखे, वैसा नहीं है रंग।
इसीलिए होते सभी, अनायास ही तंग।।
पावन मन से देखिए, हर नारी को आप।
ममता की मूरत दिखे, कैसे होगा पाप।।
आज छिपा है कशिश में, तरह-तरह का पाप।
सावधान रहिए सभी, बने नहीं अभिशाप।।
गुरु चरणों की कशिश का, इतना हुआ प्रभाव।
नहीं किसी से अब रहा, हमको आज दुराव।।
जब मन का हो संलयन, मिट जाते सब द्वंद्व।
जो भी अब तक चल रहा, हृदय बीच छलछंद।।
हुआ हमारा संलयन, ईश्वर कृपा अपार।
रहे भावना ही सदा, हो जीवन सुखसार।।
अब अपनों के बीच में, होता है संग्राम।
इससे मिलता कुछ नहीं, सब होते नाकाम।।
अपनों को ही बीच में, अविश्वास का राज।
कर पाएंगे क्या भला, मिलकर कोई काज।।
रोके से रुकते नहीं, अपने बच्चे आज।
हमको ही समझा रहे, कैसे चले समाज।।
आ बैठे यमराज जी, लेकर मुझको गोद।
समझ नहीं आया मुझे, करते रहे विनोद।।
सबके अपने सामने, होते जमकर खेल।
स्वार्थ लोभ के फेर में, बने सभी हैं रेल।।
रोज चुनौती आ हमें, धमकाती है रोज।
हम उस पर यदि ध्यान दें, कैसे होगी खोज।।
धैर्य से देखो सामने, दिखे ईश मुस्कान।
छोटी सी तो बात है, क्यों होते हैरान।।
बस इतनी सी बात है, नहीं दीजिए ध्यान।
सचिन रहेगा आपका, शेष मान सम्मान।।
बस इतनी सी बात है, रिश्ते सब लाचार।
हर प्राणी का आजकल,बदल रहा व्यवहार।।
झूठ सत्य को रौंदता, दुनिया देखे रोज।
कलयुग का सबसे बड़ा, यही आज का भोज।।
मुझको नहीं उलाहना, आप दीजिए मित्र।
चाह रहे क्या बदल दूँ, आपका पूरा चित्र।।
सुनता कौन उलाहना, कहते हैं यमराज।
धमकी देते हैं सभी, आप बिगाड़े काज।।
जो था वो भी खो दिया, टूटा नहीं गुमान।
फिर भी डींगें मारते, करते आप बखान।।
खाने को दाने नहीं, बुद्धि नहीं है शुद्ध।
टूटा नहीं गुमान है, धमकी देता युद्ध।।
बेईमानी से हुए, वो तो मालामाल।
टूटे भला गुमान क्यों, जब तक नहीं हलाल।।
दुनिया भी हैरान है, देख पाक का हाल।
टूटा नहीं गुमान है, बने बेशर्म लाल।।
जिसने भी समझा नहीं, जीवन का संदेश।
उसका जाता है बिगड़, खान-पान परिवेश।।
जीवन का संदेश है, नीति नियम सिद्धांत।
कर्म सदा ऐसा करो, होवै नहीं भ्रांत।।
जीवन में रिश्ते बड़े, होते हैं अनमोल।
मगर आज के दौर में, सभी रहे हैं तोल।।
मातु-पिता गुरुजन सभी, दें जीवन संदेश।
जो इनकी सुनता नहीं, झेले निशिदिन क्लेश।।
शोकदग्ध है यह हृदय, गया मीत जो छोड़।
सूनी-सूनी हर घड़ी, सूना-सूना जोड़।।
शोकाकुल नगरी अवध, और धरा आकाश।
दशरथ सुत वन को गए , छाया गहन उदास।।
व्यथित हृदय की सुन व्यथा, कौन बँटाए पीर।
जब अपनों ने ही दिया, मन को गहरा तीर।।
विषाद ग्रस्त मन हो गया, सपने चकनाचूर।
जीवन लगता भार सम, व्यर्थ लगे सब नूर।।
मन जिसका संतप्त है, उसे ईश वरदान।
उसे भला चिंता कहाँ, धन, दौलत, अभिमान।।
चाटुकार होता नहीं, जो होता हो दक्ष।
दृढ़ता से डटकर खड़ा, सदा सत्य के पक्ष।।
शीतलता मन में नहीं, कुंठित मानव धर्म।
काश तनिक आती हमें, निज जीवन से शर्म।।
चंद्रयान उड़ कर चला, रचने को इतिहास।
संग तिरंगा हैं लिए, चंदा मामा खास।।
अपने मन विकार का, करिए आप इलाज।
कौन छीनने आ रहा, भला शीश का ताज।।
दल का दल में कर विलय, खाते लालीपाप।
और बाद में खूब हो, द्वय को पश्चाताप।।
पद कुर्सी के लोभ में, किससे कैसा मोह।
जनता देखे दंग हो, नेताओं के द्रोह।।
कांवड़ लेकर चल दिए, भोले के दरबार।
जन-मन के उल्लास से, प्रमुदित शिव परिवार।।
प्रवल भक्ति की भावना , भूल गए सब पीर।
कांवड़ लेकर चल दिए, अब शिव हैं सरकार।।
बम-बम भोलेनाथ का, गूँज रहा उद्घोष।
कांवड़ लेकर चल दिए, लेनेशिव परितोष।।
कतरन का भी आजकल, बढ़े नित्य ही भाव।
समय-समय की बात है, मूरख करें दुराव।।
रिश्ते भी देने लगे, कतरन सा अहसास।
जैसे छुट्टा जानवर, खाते घूमें घास।।
चीनी के भी बढ़ गये, एक बार फिर दाम।
मीठा खाना कम करो, जपो राम का नाम।।
चाहे जितना भी बढ़े, अब चीनी का दाम।
मीठी वाणी बोलिए, चल जाएगा काम।।
मँहगाई के खेल में, ऐथनाल का जोर।
जन-मानस बेहाल है, चीनी का क्या ठौर।।
निर्मलता की हम सभी, बातें करते खूब।
पाप कर्म करते हुए, पर जाते हैं डूब।।
निर्मलता की ओट में, होते कितने खेल।
भले पास होते नहीं, और दिनों दिन फेल।।
ईश्वर भी तब ही सुने, जब होता विश्वास।
निर्मलता के साथ ही, करना होता आस।।
तकनीकी उपयोग से, बढ़े आज व्यापार।
समय साथ जो चल रहे, समझें इसका सार।।
सबको अपने विस्तार का, आज बढ़ा लोभ।
बिना कर्म जब फेल हों, तब होता है क्षोभ।।
जीवन करवट ले रहा, संयम रखिए आप।
हो जो भी अच्छा-बुरा, करो नहीं संताप।।
जीवन में भी सिलवटें, आना निश्चित मित्र।
आप कभी रुकना नहीं, रहो खींचते चित्र।।
महफ़िल से अब आ गए, करिए घर के काम।
बीबी भी इंसान है, दो उसको आराम।।
बुझदिल होने से नहीं, कम होता संघर्ष।
साहस से ही मिल रहा, हर प्राणी को हर्ष।।
कोमलता के भाव से, नहीं खेलिए आप।
वरना निश्चित एक दिन, भोगोगे तुम पाप।।
प्रतिभा को जो लीलती, आरक्षण वह आग।
बन जाए विकराल ये, उससे पहले जाग।।
वोट की खातिर गा रहे, सभी बेसुरा राग।
मुश्किल होगी एक दिन, आरक्षण वह आग।।
जीवन के संदर्भ का, निश्चित नहीं विधान।
बुद्धि विवेक उपयोग से, मिलती है मुस्कान।।
गुरुवर की पाकर झलक, मुझको मिला सुकून।
अब तो मेरा भी सफल, होगा हर मजमून।।
एक झलक अंतिम रही, यह कैसा संकेत।
या ईश्वर है चाहता, करना हमें सचेत।।
नशा नाश का बीज है, फिर भी इतना प्यार।
जीवन किसको कब मिला, लेने चले उधार।।
जिसे अवधि का बोध है, सिर्फ न चाहे नाम।
पूरे होते हैं सदा, उसके सारे काम।।
सबकी अपनी है अवधि, सब पर लगी लगाम।
फिर क्यों तुम हो चाहते, समय पूर्व आराम।।
चलो वक्त के संग
चलें वक्त के संग में, बुद्धिमान जो लोग।
खुशहाली के बीच वो, रहते सदा निरोग।।
अपना भारत बढ़ रहा, आज वक्त के संग।
सारी दुनिया हो रही, देख-देखकर दंग।।
मूर्ख मान उनको नहीं, मत करना तुम तंग।
जिनका निज सिद्धांत है, चलो वक्त के संग।।
चलो वक्त के संग में, मत होना गुमराह।
इसे बना लो आप भी, उन्नति पथ की चाह।।
चला वक्त के संग जो, दूर हुआ अवरोध।
क्योंकि वो करता नहीं, नाहक कोई शोध।।
रक्षाबंधन / राखी / अमर प्रेम की डोर
अमर प्रेम की डोर का, कोई नहीं विकल्प।
रिश्तों के आयाम का, नित नूतन संकल्प।।
भ्राता -भगिनी मिलन का, गुंजित होता शोर।
रक्षाबंधन ओट में, अमर प्रेम की डोर।।
रक्षाबंधन पर्व का, है ईश्वरीय विधान।
अमर प्रेम की डोर में, हम खोजें विज्ञान।।
अमर प्रेम के डोर की, सूत्रधार है खास।
भाई बहना प्यार में, देखें सभी उजास।।
बाँध प्रेम की डोर में, बहनों को हो हर्ष।
बना रहे मम मायका, सुख-समृद्धि उत्कर्ष।।
रक्षाबंधन आ गया, फैला नव उल्लास।
शीघ्र बहन-भाई मिलें, पूरी होगी आस।।
बहना आई मायके, लेकर प्यार दुलार।
रक्षाबंधन दे रहा, खुशियों का संसार।।
भले दूर दोनों रहें, पर इतना विश्वास।
कच्चे धागों में छिपी, दोनों की ही आस।।
माँ बेटी सम बहन मम, सदा झुकाऊँ माथ।
चाहूँ यह आशीष मैं, रहे शीश पर हाथ।।
राखी-धागे दे रहे, बहनों को विश्वास।
मातु-पिता के बाद भी, भाई से ही आस।।
रक्षाबंधन ने दिया, रिश्तों को नव भाव।
लड़ने भिड़ने लाड़ का, सबको रहे अघाव।।
रिश्ते केवल खून के, होते नहीं पवित्र।
रक्षाबंधन खींचता, रिश्तों का नव चित्र।।
राखी धागे बाँधंती, बहन नेह अधिकार।
भ्राता का सौभाग्य है, पाता लाड़ दुलार।।
राखी का त्योहार यह, देता है संदेश।
हर भ्राता भगिनी रखें, श्रेष्ठ कर्म परिवेश।।
केवल अपने बहन की, रक्षा का संकल्प।
हर बेटी या बहन को, दीजै यही विकल्प।।
राखी के त्यौहार की, गरिमा बड़ी महान।
हर भाई की बहन का, रखना हमको ध्यान।
वचन पालना पर्व है, बिना किसी प्रतिबंध।
इससे पावन जगत में, नहिं दूजा संबंध।।
अमर -नश्वर
कौन अमर है जगत में, जिसका उसको दंभ।
एक सत्य बस मृत्यु है, निश्कलंक स्तंभ।।
जिसको होना है अमर, पहले आए पास।
कहते हैं यमराज जी, बनिए उनके खास।।
नश्वर भौतिक तत्व सब, व्यर्थ अमरता लोभ।
जो मन में आए करो, क्यों करते हो क्षोभ।।
इस नश्वर संसार में, सबका अपना द्वंद्व।
मरना जीना छोड़कर, करें खूब छलछंद।।
नश्वर यह संसार है, नहीं व्यर्थ दो ज्ञान।
जैसे भी हो घर भरो, कलयुग का विज्ञान।।
खुशियों की बरसात
खुशियों की बरसात का, बनें सभी आधार।
नीति नियम सिद्धांत औ, संग प्रेम व्यवहार।।
सतगुरु की इतनी कृपा, बरस रही दिन रैन।
खुशियों की बरसात से, भीगें भक्तन नैन।।
मात-पिता गुरुवर करें, कभी न उल्टी बात।
शुभ आशीषों से करें, खुशियों की बरसात ।।
जीवन में होगी तभी, खुशियों की बरसात।
राष्ट्र प्रथम की भावना, बिना घात- प्रतिघात।।
जिस घर अरु परिवार में, सबको सबका ध्यान।
खुशियों की बरसात का, वहाँ प्रेम विज्ञान।।
मजबूरी की मार
मजबूरी की मार जो, झेल रहे हैं नित्य।
प्रश्न पूछते ईश से, क्या है ये औचित्य।।
होते जितने इन दिनों, राजनीति के खेल।
मजबूरी की मार से, निकल रहा है तेल।।
मजबूरी की मार का, नहीं शिकायत ईश।
मान रहे हम तो इसे, दिए आप बख्शीश।।
कुछ लोगों के जन्म का, यही एक है सार।
सहना उनको उम्र भर, मजबूरी की मार।।
पढ़ें लिखे जो हैं युवा, उनमें द्वंद अपार।
सहना उनको पड़ रहा, मजबूरी की मार।।
सबसे रखना मेल
सीधी सी ये बात है, सबसे रखना मेल।
बिना किसी व्यवधान के, तब दौड़ेगी रेल।।
सबसे रखना मेल तुम, कहे मित्र यमराज।
खुशियों का सिर पर सदा, बजे आपके ताज।।
खुशियों की सौगात का, चाह रहे उपहार।
सबसे रखना मेल ही, उत्तम है आधार।।
नीति नियम सिद्धांत से, खेलों सारे खेल।
जीवन पथ की राह में, सबसे रखना मेल।
बिगड़े बोल जनाब
कलयुग के इस दौर में, होता बहु अन्याय।
बिगड़े बोल जनाब के, कहते वही सहाय।।
नेताओं के इन दिनों, बिगड़े बोल जनाब।
देखें इसकी आड़ में, हैं सत्ता का ख्वाब।।
सत्ता उनसे दूर है, यही बड़ा है दर्द।
बिगड़े बोल जनाब के, फटा हुआ जस फर्द।।
रिश्ते होते जा रहे, सबके आज खराब।
मर्यादा की छोड़िए, बिगड़े बोल जनाब।।
नीति नियम सिद्धांत है, आज व्यर्थ की बात।
बिगड़े बोल जनाब के, करें खूब वे घात।।
बिगड़े बोल जनाब के, रहिए इनसे दूर।
भूसा भरा दिमाग में, बहुत हुए मगरूर।।
बिगड़े बोल जनाब, कहते हैं हम लोग।
दोषी क्या यमराज है, फैल रहा जो रोग।।
कैसे भरें उड़ान
करते रहें विचार सब, कैसे भरें उड़ान ।
बिना इच्छा शक्ति नहीं, मिलता किसे मचान।।
तभी आप ये सोचिए, कैसे भरें उड़ान।
लक्ष्य मिले तब जानिए, जब निज हाथ कमान।।
मन में डर की भावना, कैसे भरें उड़ान।
नहीं राह होगी सरल, बने रहो अंजान।।
आप किसी से पूछिए, कैसे भरें उड़ान।
बस उनका इक बार तो, आप करो गुणगान।।
कहते हैं यमराज जी, कहाँ तुम्हारा ध्यान।
भूल रहे तुम क्यों भला, कैसे भरें उड़ान।।
मौसम के अनुसार
मौसम के अनुसार ही, खेती करते लोग।
उत्पादन को मानते, बस केवल संयोग।।
रखें स्वास्थ्य का ध्यान सब, मौसम के अनुसार।
रोग मुक्त रहिए सदा, यही प्रकृति का सार।।
मौसम के अनुसार जो, चलता जीवन राह।
तन-मन में उसके सदा, होता है उत्साह।।
करना सबको चाहिए, मौसम का सम्मान।
यदि ऐसा करते नहीं, तो फिर हैं नादान।।
मौसम के अनुसार जो, लेता है आहार।
दिखता दैनिक कर्म में, वैसा ही व्यवहार।।
सहता मार गरीब
रोते रहने से कभी, बदले नहीं नसीब।
यही आज का सत्य है, सहता मार गरीब।।
सहता मार गरीब है, पर करता संतोष।
और नहीं देता कभी, व्यर्थ किसी को दोष।।
सहता मार गरीब है, फिर भी रखता ज्ञान।
वक्त -वक्त की बात है, व्यर्थ सभी विज्ञान।।
दया धर्म जिनके लिए, लगता ईश समान।
भले मार सहता रहे, बना गरीब महान।।
बड़ी बात क्या है भला, सहता मार गरीब।
पर वो होता प्रभु के, मानो आप करीब।।
देश
आज देश में बढ़ रहा, शहरी नक्सलवाद।
कुछ लोगों को लग रहा, यही बनेगा खाद।।
पुश्तैनी है देश पर, मम सत्ता अधिकार।
कर सकता दूजा नहीं, कोई बेड़ा पार।।
पुरखों ने बोया जहर, नव पीढ़ी को ज्ञान।
देश नहीं उनके लिए, बस कुर्सी विज्ञान।।
देश लूटकर खा गए, जिनके अपने खून।
आज वही समझा रहे, पढ़ा लिखा मजमून।।
जाति-धर्म के खेल में, पिसता जाए देश।
प्रतिभा कुंठित हो रही, सिसक रहा परिवेश।।
आपदा /जलजला
नहीं पता है आपदा, कर दे कब उत्पात।
छिन्न भिन्न सब सामने, आने के पश्चात।।
कुदरत के इस कहर का, होता गहरा दंश।
माथा पीटें लोग सब, मिला उन्हें जो अंश।।
आई है जो आपदा, कैसे करें बयान।
दूर -दूर तक दिख रहा, सब कुछ हुआ वीरान।।
आती है जब आपदा, खुल जाते कुछ भाग्य।
लूटपाट कर मानते, सोई किस्मत जाग्य।।
आया ऐसा जलजला, आबादी वीरान।
चहल-पहल थी कल जहाँ, वहीं आज श्मशान।।
आया कैसे जलजला, इस पर करो विचार।
छेड़-छाड़ की प्रकृति से, वही बनी आधार।।
नहीं दोष है प्रकृति का, कब तक सहती वार।
रूप जलजला ने धरा, करने को प्रतिकार।।
हिम से उतरा जल प्रलय, संकट में नेपाल।
घर-आँगन सब बह चले, हाहाकारी काल।।
माँगे सबकी खैर
विरले हैं अब लोग कुछ, माँगे सबकी खैर।
अपने पहले ठानते, रोज-रोज ही बैर।।
माँगे सबकी खैर जो, कहलाता नादान।
स्वार्थ लोभ की चाह में, सुने बेसुरा गान।।
करे भरोसा ईश पर, माँगे सबकी खैर।
नहीं समझता वो कभी, अपना है या गैर।।
भला उसे क्या है पड़ी, मांगे सबकी खैर।
ईर्ष्या-द्वेष से दूर वो, करता रहता सैर।।
घाव बने नासूर
घाव बने नासूर क्यों, पहले देना ध्यान।
मूरख तो तुम हो नहीं, हम क्या देंगे ज्ञान।।
अंजाने में कब भला, घाव बने नासूर।
जब तक हम बनते नहीं, जानबूझकर सूर।।
सावधान रहिए सभी, मद-मस्ती से दूर।
नहीं बोध यदि आपको बोध, घाव बने नासूर।।
कुछ लोगों के हो गए, सपने सारे चूर।
छोटा सा काँटा लगा, घाव बना नासूर ।।
अपनों के ही वार से, हम इतना मजबूर।
मरहम-पट्टी क्या करें, घाव बना नासूर।।
ज़ख्म मिला जो भी हमें, उसका नहीं है रोष।
घाव बना नासूर अब, दें हम किसका दोष।।
करते जिन पर गर्व हम, और संग मगरूर।
आज ज्ञान मुझको हुआ, घाव बना नासूर।।
दोहा -बदल गया इंसान
बदली जग की रीति है, बदल गया इंसान।
मतलब की दुनिया हुई, जैसे नई मशीन।।
बदल गया इंसान है, क्और संग में दौर।
कुटिल हँसी मुख पर दिखे, नहीं किया क्या गौर।।
भूल-भाल सब प्यार अब, बदल गया इंसान।
रिश्ते लगते बोझ हैं, मुफ्त बाँटते ज्ञान।।
बदले सब जज्बात हैं, बदल गया इंसान।
कल तक अपने जो प्रिए, आज हुए हैवान।।
बदल गई हैं चाहतें, और बढ़ा अभिमान।
अपने मुँह से मत कहो, बदल गया इंसान।।
भूल गया नादान
भूल रहा क्यों स्वयं की, खुद अपनी पहचान।
स्वार्थ लोभ में फंस गया, भूल गया नादान।।
समझाना सब व्यर्थ है, रहा कौन दे ध्यान।
आज हमें ही गर्व से, भूल गया इंसान।।
भूल गया इंसान अब, नीति नियम अरु धर्म।
इसीलिए तो कर रहा, उल्टे सीधे कर्म।।
मातु-पिता अपमान कर, बने आधुनिक वीर।
भूल गया इंसान क्यों, बिन समझे ही पीर।।
अपनी कोई है नहीं, शेष बची पहचान।
यही आज का दंश है, भूला सब इंसान।।
