कविता

मूक दर्शक

अक्सर महसूस करती हूँ
आत्मा दूर खड़ी
गतिमान है,
तन्हा शरीर
संवेदनाहीन
ज़िंदगी के रास्तों पर गतिमान है।

जैसे कठपुतली के धागे
छूट गए हों हाथों से,
पर पैर अब भी
गतिमान हैं थिरक रहे हैं आदतन।

साँसें चल रही हैं एक नियम की तरह,
पर धड़कनों में कोई राग नहीं,
भीड़ खड़ी है चारों तरफ मेरे,
पर अंतर सन्नाटे का कोई अंत नहीं।

मैं देख रही हूँ खुद को
एक अजनबी की तरह दूर से,
कि जिए जा रहा है कोई मेरी जगह,
बिना मेरी रज़ा के, मजबूरी से।

सारे अहसास कहीं जम से गए हैं,
न कोई शिकवा, न कोई आस है,
निस्पृह वह आत्मा,
इस जीवन-यात्रा की एकमात्र साक्षी है।

— डॉ. अनीता पंडा ‘अन्वी’ बैंगलुरु

*डॉ. अनीता पंडा

सीनियर फैलो, आई.सी.एस.एस.आर., दिल्ली, अतिथि प्रवक्ता, मार्टिन लूथर क्रिश्चियन विश्वविद्यालय,शिलांग वरिष्ठ लेखिका एवं कवियत्री। कार्यक्रम का संचालन दूरदर्शन मेघालय एवं आकाशवाणी पूर्वोत्तर सेवा शिलांग C/O M.K.TECH, SAMSUNG CAFÉ, BAWRI MANSSION DHANKHETI, SHILLONG – 793001  MEGHALAYA aneeta.panda@gmail.com 

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