सामाजिक

शांति ही परम धन,समृद्धि के शोर में खोती आत्मिक शांति

मानव सभ्यता इतिहास के सबसे समृद्ध दौर से गुज़र रही है। हमारे पास तकनीक है, गति है, चिकित्सा के आधुनिक साधन हैं और भौतिक सुख-सुविधाओं का वह अंबार है जिसकी कल्पना कुछ दशक पहले तक नहीं की जा सकती थी। लेकिन इस अकूत भौतिक प्रगति के समानांतर एक कड़वा सच यह भी है कि आज का मनुष्य इतिहास के सबसे अशांत और तनावग्रस्त दौर में जी रहा है। बहुमंजिला इमारतों, चमचमाती गाड़ियों और बढ़ते बैंक बैलेंस के बीच एक बुनियादी सवाल गुम हो गया है,यदि जीवन में शांति ही नहीं, तो इस तमाम धन-दौलत का अर्थ क्या है?

दरअसल, वर्तमान परिवेश में हमने ‘सफ़लता’ की परिभाषा को केवल भौतिक संपदा से जोड़ दिया है। सुबह की पहली किरण से लेकर देर रात तक हमारी पूरी ऊर्जा इस बात में खप रही है कि कैसे दूसरों से आगे निकला जाए, कैसे और अधिक अर्जित किया जाए। इस अंधी दौड़ में शरीर तो आराम के साधन पा लेता है, लेकिन मन लगातार एक अज्ञात भय, असुरक्षा और असंतोष की आग में जलता रहता है।

“यदि करोड़ों का साम्राज्य खड़ा करने के बाद भी मन में शांति न हो और रात को नींद के लिए गोलियों का सहारा लेना पड़े, तो इसे सफ़लता नहीं बल्कि आत्मिक दरिद्रता ही कहा जाएगा।

आखिर क्यों दुर्लभ हो गई शांति?

तुलना का आधुनिक जाल,सोशल मीडिया आधारित इस दौर में लोग अपनी वास्तविक उपलब्धियों का आनंद लेने के बजाय दूसरों के आभासी प्रदर्शन से अपनी तुलना कर रहे हैं। जब जीवन का ध्येय स्वयं को बेहतर बनाना न होकर केवल दूसरों से बेहतर दिखना बन जाए, तो असंतोष का जन्म होना तय है, जिससे आंतरिक शांति पूरी तरह भंग हो जाती है।

सुख और शांति में भ्रम, हमने सुख को बाज़ार से ख़रीदी जाने वाली वस्तुओं से जोड़ दिया है। नया स्मार्टफोन, नई गाड़ी या बड़ा मकान क्षणिक सुख तो दे सकते हैं, लेकिन वे मन को स्थायित्व और शांति नहीं दे सकते। शांति कोई बाह्य वस्तु नहीं, बल्कि एक आंतरिक स्थिति है।

असीम तृष्णा और कृतज्ञता का अभाव,हमारी इच्छाएं एक पड़ाव पर रुकने के बजाय दोगुनी गति से आगे भागने लगती हैं। जो हमारे पास उपलब्ध है,उत्तम स्वास्थ्य, परिवार, भोजन हम उसके प्रति आभार व्यक्त करना भूल चुके हैं। जो नहीं है, केवल उसी का मलाल करना मन की शांति छीन लेता है।

यदि इस स्थिति से बाहर निकलना है, तो समाज और व्यक्ति दोनों के स्तर पर एक वैचारिक परिवर्तन की आवश्यकता है। हमें यह समझना होगा कि धन-दौलत जीवन को आसान बनाने का साधन मात्र है, जीवन का अंतिम साध्य नहीं।

शांति का धन किसी वसीयत में नहीं मिलता, न ही इसे बाज़ार से खरीदा जा सकता है। इसे पाने के लिए अपनी ज़रूरतों और इच्छाओं के बीच की रेखा को पहचानना होगा, वर्तमान क्षण में जीने का अभ्यास करना होगा और प्रतिदिन थोड़ा समय ख़ुद के साथ मौन में बिताना होगा। जब तक मनुष्य बाहर की दौड़ छोड़कर अपने भीतर झाँकना शुरू नहीं करेगा, तब तक समृद्धि के महलों में अशांति का सन्नाटा ऐसे ही गूँजता रहेगा।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़ 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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