कहानी

अंदरूनी शैतान या भेंस के सामने बीन बजाने की लत

आप उन लोगों के बारे में क्या सोचते हैं, जो किसी भी स्थिति में सच को सच कहते हैं और झूठ को झूठ। कोई बोलेगाः ‘भोले-भाले’, कोई हंसकर निष्कर्ष निकालेगाः ‘मूर्ख’, तो कोई ‘ईमानदारी और साहस की असली पहचान वाले लोग’ कहेगा। मैं कोई साहसी वीर या भोला-भाला मूर्ख नहीं हूं। मैं समझता हूं कि सच सदा कड़वां होता है और इसे बहुत कम ही लोग पसंद करते हैं। इसी लिये मैं सच और सच्चाई के लिये संघर्ष में कूदने की चपलता नहीं दिखाता। और तो और, मेरा जन्म और पालन-पोषण सोवियत संघ में हुआ था और रूस के सभी लोगों की तरह मैंने इस सत्य को अच्छी तरह से पल्ले में बांध लिया है कि सच्ची बात कहने से आज़ादी या जीवन तक छुट सकता है।
लेकिन इन सब के बावजूद मेरे अंदर कहीं गहरे में एक छोटा सा मनचला नटखट शैतान रहता है और यह कह कर मुझे उकसाता है कि ‘उन्हें यह बता दो, वह बता दो, समझा दो। इन बेचारों को पता ही नहीं।‘ इसी मुश्तंदे के कारण मैंने अपने होनेवाले ससुर और उनके परिवार के साथ पहली ही मुलाकात में रिशता बिगाड़ लिया। ससुर जी को जब पता चला कि मैं यहूदी हूं और उनकी पुत्री से शादी करना चाहता हूं तो उन्होंने कम्यूनिस्ट देवता लेनिन की तरह मुझे तिरछी आंखों से देख कर पूछाः ‘ज़रा बोलो, भैया, उज़बेकिस्तान में (तब में उज़बेकिस्तान का रहनेवाला था) यहूदी विरोधी भावनाएं फैली हैं क्या?’ तो मेरी प्रशिक्षित जीभ आदत से ये ढले हुए शब्द उगलनेवाली ही थी कि ‘यह आप क्या कह रहे हैं? उज़बेकिस्तान में हम सभी भाई भाई हैं। सब लोगों के लिये यहूदी जान से प्यारे होते हैं!’ लेकिन उस क्षण अंदरूनी शैतान पर मेरा नियंत्रण छुट गया और वह मौका पाकर कह बैठाः ‘यहूदी विरोधी भावनाएं उज़बेकिस्तान में मॉसको से आई थीं और स्थाई निवासी बन गयी हैं।‘ ससुर को मेरे शैतान के खुलासे अपने देश की बदनामी लगे होंगे, तो आगे चलकर उन्होंने मुझे पूंजीवादियों का एजेंट समझकर मेरी उपस्थिति में चुप्पी साध ली, ताकि कहीं देश का कोई रहस्य शत्रुओं के हाथ न लगे। मानो या न मानो, उनका संदेह सही निकला। जब सोवियत संघ के दरवाज़े ढीले हुए, तो मैं अपना परिवार लेकर पूरी ताकत के साथ इन दरवाज़ों से होकर इज़रायल की तरफ़ कूद पड़ा।
इज़रायल में! आज़ादी! न केवल सही सोचने, बल्कि सच्ची बात बोलने की भी आज़ादी! किसी आज़ाद देश में एक नेक और सात्विक इंसान होने से शर्माने की क्या ज़रूरत? और इतने में मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई – मैंने अपने अंदरूनी शैतान को खुला छोड़ दिया… और उसे जैसे इसका इंतज़ार ही था! वह साम्यवाद, इसलाम और अरबों के बारे में दिल खोलके ऐसी बातें करने लगा कि अगर मैं सोवियत संघ में रहता तो बहुत पहले ही सीक्रेट पुलिस की काल कोठरी में सड़ गया होता। पर इज़राइल में मैं इससे बच गया। अभी तक ज़िंदा हूं। लेकिन न जाने क्यों ज़ोरों की तालियों की जगह मुझे छात्रों के विस्मित और डरे हुए चेहरे मिले। बाद में पता चला कि विश्वविद्यालयों में सच्ची बातें सुनकर लोगों का जी बैठ जाता है और पाचन प्रणाली में गड़बड़ी हो जाती है। तब मैंने अपने अंदरूनी शैतान को कठोरता से और डरावनी आवाज़ में चुप रहने को कहा।
शैतान को बुरा लगा और वह मेरे मस्तिश्क के किसी दूर-दराज और दुर्गम दरार में गूंगा-बहरा बनके छुप गया। उसकी ख़ामोशी का फ़ायदा उठाकर मैंने विश्वविद्यालय में अपना काम जारी रखा, हालांकि करियर में आगे बढ़ने की उम्मीद नहीं रही। फिर भी भारतियों ने हिंदी शिक्षन में मेरी कुछ उपलब्दियों को देखकर सम्मानित किया। और फरवरी 2010 के एक सुहावने दिन मुझे दिल्ली के एक अंतर्राष्ट्रीय हिंदी उत्सव में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया, जहां मुझे हिंदी के प्रचार-प्रसार में योगदान के लिये यादगारी स्मृति चिह्न भी सौंपा गया। सम्मेलन के उद्घाटन पर मुख्य अतिथियों को पहले बोलने का मानद अधिकार है। मैं भी दूसरे अतिथियों की तरह मंच पर चढ़ आया। जैसा कि होता है, मैंने अपना भाषण पहले से तैयार किया था। लेकिन ज़ाहिर है कि शैतान के दख़ल से ही पुरस्कार जीतनेवाले के आभार भरे मीठे भाषण में सच्चाई की एक कड़वीं बूंद पड़ी। पहले तो मैंने उसपर ध्यान भी नहीं दिया – इतना छोटा था वह। बस तीन शब्दों का वाक्य। बाद में मैंने इसको लेकर अपने शैतान को ख़ूब फटकार लगाई। वह कहावत सही है कि ‘होंठ निकली, कोठ चढ़ी’। और मैंने एक शब्द नहीं, पूरे तीन शब्द बोले। जब्कि मेरे निकट मंच पर बड़े ही महत्त्वपूर्ण मेहमान, दिग्गज सरकारी अधिकारी विराजमान थे। उनमें मुख्य व्यक्ति डॉ.करण सिंघ थे। ओह! भारतियों को इनका परिचय कराने की क्या ज़रूरत? वे सचमुच पूरे भारत में एक महान व्यक्तित्व हैं। यूं कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि वे उन हाथियों में से एक थे जिनके सहारे उस समय की सत्तारूढ़ इंडियन नेशनल कॉग्रेस पार्टी कायम थी। तीन साल पहले न्यू यॉर्क में विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान मुझे उनके हाथों पुरस्कार (चांदी की अलंकृत प्लेट) मिला था। और अब मंच पर इतने सम्मानित वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की उपस्थिति में कई सौ लोगों को संबोधित कर के मैं विश्व में हिंदी की लोकप्रियता की बात कर रहा हूं। अपने भाषण के आरंभ में ही मैंने एक उदाहरण के तौर पर यह भी कहाः ‘मैंने हिंदी उज़्बेकिस्तान की राजधानी ताश्कंद में पढ़ाई, रूस की राजधानी मॉस्को में पढ़ाई और अब इज़रायल की राजधानी यरूशलम में पढ़ा रहा हूं’ … हॉल में मरघट सा सन्नाटा पसर गया। ऐसा लगा कि लोगों ने सांस लेना भी बंद कर दिया। मैंने मंच पर बैठे हुए दिग्गजों की तरफ़ नहीं देखा लेकिन स्पष्ट था कि वे भी स्तब्ध हुए। इस लिये नहीं कि हिंदी इतनी लोकप्रिय है विश्व में, बल्कि इस लिये कि यरूशलम इज़रायल की राजधानी है। भारत के समाजवादियों ने अनिच्छा से सही इजरायल के अस्तित्व को मान ही लिया लेकिन साथ ही साथ ‘प्रगतिशील मानवता’ का यह फ़ैसला भी स्वीकार कर लिया कि इज़रायल की राजधानी कहींनहींपुरम है। मुझसे नई भौगोलिक जानकारी पाकर हॉल में बैठे दर्शक काफ़ी उत्साहित हो गए, उनकी प्रतिक्रिया देखते ही बनती थी। इन्होंने हमदर्दी से मेरी बातों का ज़ोरों की तालियों से अभिवादन किया और मेरी कई चुटकियों पर कहकहे लगाए। लेकिन तीन-चार मिनट भी नहीं हुए कि मेरे बगल में कोई महाशय उभर कर आया और मेरे नाक के सामने एक परची परोसी, जिसमें भाषण समाप्त करने का आग्रह था। लिखा था कि ‘आज ज़्यादा समय नहीं है। यदि आप अपनी बातें आगे रखना चाहें तो कल की बैठक में रख सकते हैं।‘ वैसे कल भाषण-वाषण का कोई कार्यक्रम नहीं होनेवाला था। खैर, मैंने हाथ जोड़कर दर्शकों से विदा किया। सब इस बात के गवाह थे कि पर्ची ने कैसे मेरी बातों को काट दिया। तो मंच की सीढ़ियों से मैं नीचे ज़ोरदार तालियों के साथ उतरा। मुझे वही एहसास हुआ जो प्रसिद्ध कलाकारों को अपनी शोहरत के शिखर पर महसूस होता है। अंतराल में बाहर निकल कर मैं लोगों की एक बड़ी भीड़ से घिर गया। सब ने मुझसे हाथ मिलाया और कॉफरन्स की औपचारिकता की शिकायत की।
मैं तो मंच से तालियां सुन कर उतरा, पर चार ही साल बाद हाथी चरण सिंघ समेत सभी वरिष्ठ अधिकारी जनता की सीटियों और मज़ाक के बीच राजनैतिक मंच से लुढ़क गए। मोदी जी का ज़माना आ गया।
इस पर अंदरूनी शैतान के साथ मेरा तर्क-वितर्क ख़त्म नहीं हुआ। भारत में स्वच्छ राजनीतिक शक्तियों की जीत हुई, लेकिन इजरायल के विश्वविद्यालय तो संप्रभु हैं, वास्तविकता को अपने ही चशमे से देख रहे हैं। उनके ज्ञानी यदि इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ‘फ़ासिस्ट’ मोदी भारत के लिये आफ़त है, तो यही सत्य है। मार्क्स और ओबामा से हमें जो वैज्ञानिक विरासत मिली है, उसपर सवाल उठाने का कोई मतलब नहीं।
पर दो साल हुए मुझे हमारे विभाग द्वारा ” इंडिया क्लब ” के कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था। मैं इसमें हिस्सा नहीं लेने वाला था, क्योंकि मुझे सही में खटका था कि मेरे अंदर का शैतान मुझे ज़रूर कन्फ्यूज़ कर देगा। लेकिन छात्रों ने मुझे ख़ूब मनाया, और आखिरकार मैंने आमंत्रण स्वीकार ही लिया। कार्यक्रम में व्याख्यान देने या वैज्ञानिक खोजों को साझा करने की ज़रूरत नहीं थी। ये ऐसी हल्की-फुल्की सभाएं होती हैं जहां शिक्षकगण भारत में अपने रहने से जुड़ी हास्यप्रद कहानियों से विद्यर्थियों का मनोरंजन करते हैं। उनमें जैसे होड़ लगती है कि कौन भारतियों का ज़्यादा मजाक उड़ाएगा। एक बार मैंने छात्रों को इस विषय पर बात करते सुना था कि किस शिक्षक की कहानी अधिक मौज-मस्ती वाली थी। तो मैं हंसानेवाली कौनसी गप्पें मार सकता था? तब मेरे अंदर के शैतान ने सलाह दी कि ‘उस दिन की कहानी सुनाओ जब तुम्हें यरुशलम को राजधानी कहने पर मंच से भगाया गया।‘ इसमें हंसने की क्या बात है? – मैंने कहा। वि.वि. के सभी अध्यापक और छात्र भी यही समझते हैं कि इज़रायल की राजधानी कहींनहींपुरम है। तब मुझे यह सुनाने का ख़याल आया कि यात्राओं के दौरान मुझे अनेक लोगों से दोस्ती के रिश्ते स्थापित करने में हिंदी की जानकारी कैसे काम आई। जैसा सोचा वैसा ही किया। कई फ़ोटो चुन कर मैं क्लब के कार्यक्रम में भाग लेने गया। एक बड़े सभागर में बड़ी संख्या में भारत से रुचि रखनेवाले लोग आए। स्पष्ट है कि उनमें अधिकांश विद्यार्थी थे, मगर कुछ मेहमान भी पहुंचे। कई सेवानिवृत वृद्धों के लिये यह निःशुल्क तमाशा था।
हमेशा की तरह सभा का उद्घाटन ऊदी ने किया जिन पर प्रोफ़ेसर पद का बोझ अभी नहीं पड़ा। वे क्लब के संयोजक हैं और मज़ेदार कहानियां सुनाने में बेजोड़। सब की हंसी के बीच उन्होंने सुनाया कि एक बार राजस्थान के एक दूर-दराज ग्राम में वे किस तरह स्थानीय लेडीज़ को यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि इज़रायल के हर घर में पानी की नलें होती हैं जिनसे जितनी मरज़ी पानी मिल सकता है।
फिर मीख़ाल बोलने लगी। मीख़ाल एक अनोखी युवति हैं। इतनी जवान होने पर भी इतनी बुद्धिमान और डॉक्टर की उपाधीवाली अध्यापिका हैं। जिस विद्या के क्षेत्र में वे भटक गईं वह हिंदू समुदाय और रस्मो-रिवाज हैं। इस लिये इसी विषय पे वे मजाक भी कर रही थीं। इन हिंदुओं ने अपनी विकृत चेतना से कितने नियम और विश्वास बना लिए हैं! उन्होंने हंसते हुए बताया कि कैसे वह अक्सर अपने दोस्तों के परिवारों के रीति-रिवाजों में भाग लेते समय गड़बड़ी में उलझ जाती थीं। वह शेष लोगों से ज़्यादा ज़ोर से हंसी, जिससे यह साफ़ हो गया कि कहानी कितनी मज़ेदार थी।
संस्कृत के अध्यापक राफ़ी को मेहमानों को हंसाने के लिये चुटकुले सुनाने की ज़रूरत भी नहीं थी। हंस कर लोट-पोट हो जाने के लिये उनका बेवकूफ़ चेहरा देखना ही काफ़ी था। लेकिन फिर भी उन्होंने लोगों का मन बहलाने के लिये कोई कहानी सुनाना अपना कर्तव्य समझा। वह उस दिन की कहानी थी जब वह दक्षिण भारत में एक हिंदू मंदिर देखने गया और मंदिर के पुरोहित यह जानकर कि वह संस्कृत का टीचर है, उनके साथ संस्कृत में बातें करने लगे। यह सुनाते हुए राफ़ी इतना हंसा कि पेट में बल पड़ गये। ‘ये कितने अजीब लोग हैं! – राफ़ी हंसी के कारण मुश्किल से सांस ले रहे थे, – उन्होंने सोचा कि मैं उनके साथ संस्कृत में संवाद कर सकूं!’
अब मेरी बारी आ गई। शुरू शुरू में सब ठीक ठाक चला। लोग नहीं हंसे मगर स्पष्ट रूप से मेरी बातों को रुचि से सुन रहे थे। अपने भारतीय मित्रों की कहानी सुनाते सुनाते मैं नगर वर्धा में रहनेवाले एक मुस्लिम परिवार के फ़ोटो तक पहुंचा। यह भी सुनाया कि उन लोगों ने कितनी गर्मजोशी से अपने घर में मेरा और मेरे छात्रों का स्वागत किया। यह भी कहा कि हमारा मैत्रिपूर्ण संपर्क आगे भी फ़ैसबुक के माध्यम से बना रहा। और फ़ोटो पर जो किशोर लड़की थी वह बड़ी हो गई, विवाह किया, दो प्यारे बच्चों को जन्म दिया और सामाजिक गतिविधियों में लग गई। अब वह नगर वर्धा की भाजपा शाखा में मुसुलमान महिलाओं की नेत्री है। … धम!!! – धड़ाम!!! परमाणु बम फट गया!!! मेरे अंदर के शैतान ने फिर से तोड़-फ़ोड़ मचाया! ‘मैंने ऐसी क्या बात कही?’ – बाद में अपनी सफ़ाई में वह तर्क दे रहा था, – ‘यह तो सच है! यह तो वास्तविकता है!’ – ‘अरे मुर्ख! यहां किसको तुम्हारे सच की ज़रूरत है?’ – मैं आक्रोश से उबल रहा था, – ‘अब मैंने तुम्हारी वजह से खुले आम छात्रों के सामने यह घोष्णा कर दी है कि उनके शिक्षक बेशर्मी से यह झूठ बोलते हैं कि भाजपा हिंदू फ़ासिस्टों का दल है जिसका एकमात्र लक्ष्य शाकाहारी होने पर भी सब मुसुलमानों को खा जाना है और इस तरह खाद्य समस्या से निपट जाना।‘
सभागर में उपस्थित शिक्षक बेबसी से एक दूसरे को देखने लगे इस उम्मीद से कि कोई यह भयंकर अपमान रोके। ऊदी मेरी बातों के पहले झटके के बाद जब होश में आये तो समझ गए कि मेरे पास इस तरह की और बहुत सी मज़ेदार कहानियां होंगी। सभा को बचाना था। तब मुझे कड़ी नज़र से देखते हुए उन्होंने साफ़-साफ़ कहाः ‘गेनादी, समय बहुत कम है और बोलनेवाले कुछ और हैं। इस लिये खत्म करिये!’
और आगे बोलने की क्या ज़रूरत थी? बम फट चुका है।… जब अंदर के शैतान भेंस के आगे बीन बजाते हैं तो परिणाम ऐसे ही होते हैं। अगले वर्ष ‘इंडिया क्लब’ की बैठक में मुझे किसी ने नहीं बुलाया। लेकिन, इस डर से कि मैं खुद ही आ धमकूंगा, उन्होंने मुझे एक ई-पत्र भेजा कि ‘हमें क्लब की मीटिंग में आपको देखकर खुशी होगी, लेकिन अगर आप आ न पाएं, तो हम बुरा नहीं मानेंगे…

— डॉ. गेनादी श्लोम्पेर

डॉ. गेनादी श्लोम्पेर

मैं इज़रायल में रहनेवाला हिंदी शिक्षक हूं, तेल-अवीव वि.वि. के पूर्वी एशिया विभाग में कार्यरत। हिंदी में मेरे अनेक लेख और हिब्रू भाषा से हिंदी में अनुवाद छपे हैं।

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