पसीने से पहचान तक : महिला किसान का नया अधिकार
किसान की पहचान अगर जमीन के कागज से होती है, तो खेत में पसीना बहाने वाली महिला कौन है? यही सवाल महाराष्ट्र के महिला किसान अधिकार कानून ‘महाराष्ट्र महिला किसान सशक्तिकरण अधिनियम, 2026’ ने उठाया है। यहां जमीन पुरुष के नाम है, लेकिन खेती का बड़ा हिस्सा महिला संभालती है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के अनुसार राज्य की कृषि कार्यशक्ति में महिलाओं की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक है, जबकि भूमि स्वामित्व में उनका हिस्सा करीब 15 प्रतिशत है। ये आंकड़े उस विरोधाभास को उजागर करते हैं, जिसमें श्रम महिला का है और किसान की पहचान पुरुष के नाम। नया कानून कहता है कि किसान होने की कसौटी केवल जमीन का मालिकाना नहीं, खेती में किया गया वास्तविक श्रम भी हो सकता है। यह प्रशासनिक सुधार नहीं, किसान की परिभाषा में बुनियादी बदलाव है।
अब किसान कहलाने के लिए जमीन का मालिक होना जरूरी नहीं—खेती में सक्रिय होना पर्याप्त हो सकता है। 18 वर्ष से अधिक आयु की वह महिला, जो एक मौसम भी फसल उत्पादन या कृषि-संबंधी गतिविधि में सक्रिय रही है, महिला किसान प्रमाणपत्र की पात्र हो सकती है। इसमें खेती के साथ डेयरी, मत्स्य पालन, कुक्कुट, रेशम और वन उपज भी शामिल हैं। प्रमाणपत्र ग्रामसभा के प्रस्ताव पर नामित अधिकारी जारी करेगा। राष्ट्रीय किसान नीति, 2007 ने महिला किसानों की पहचान और अधिकारों की दिशा दिखाई थी, लेकिन ऐसा राज्य-स्तरीय प्रयोग सामने नहीं आया था। महाराष्ट्र ने अब उसे प्रशासनिक रूप देने की पहल की है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि खेत में काम करने वाली भूमिहीन महिलाएं भी किसान पहचान पा सकती हैं, जो जमीन अपने नाम न होने के कारण अब तक सरकारी व्यवस्था में अदृश्य थीं।
पहचान का असली मूल्य तब है, जब वह बंद दरवाजे खोल दे। महिला किसान प्रमाणपत्र का उद्देश्य इसी पहचान को ऋण, फसल बीमा, सब्सिडी, कृषि योजनाओं, प्रशिक्षण और बाजार तक पहुंच में बदलना है। यानी जो महिला अब तक खेत में श्रमिक मानी जाती थी, उसे आर्थिक व्यवस्था में किसान के रूप में जगह मिले। इसके लिए राज्य महिला किसान कोष, डिजिटल डेटाबेस, मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली सशक्तीकरण परिषद और जिला स्तर पर सहायक अधिकारियों की संस्थागत व्यवस्था की गई है। क्योंकि अधिकार कानून की किताब में नहीं, उसके अमल में जीवित रहता है। प्रमाणपत्र से बैंक तक, बैंक से ऋण तक और ऋण से उत्पादन तक रास्ता खुले—तभी किसान की पहचान वास्तविक आर्थिक शक्ति बनेगी।
नाम बदलने से कभी-कभी पूरी जिंदगी का अर्थ बदल जाता है। महिला के हाथ में किसान प्रमाणपत्र आते ही सरकारी दफ्तर में उसकी पहचान किसी किसान की पत्नी या परिवार की महिला नहीं, स्वयं किसान की होगी। यह बदलाव छोटा नहीं है। पहचान आत्मविश्वास देती है और आत्मविश्वास निर्णय की ताकत बढ़ाता है। कृषि संकट को हम मौसम, कर्ज, लागत और बाजार से जोड़कर देखते हैं, लेकिन उसके भीतर महिलाओं के श्रम की अदृश्यता का संकट भी है। जिस मेहनत का सरकारी रिकॉर्ड में नाम नहीं, वह स्वतंत्र आर्थिक शक्ति कैसे बने? महाराष्ट्र का कानून इसी अनदेखे श्रम को पहचान और रिकॉर्ड देने की कोशिश है।
किसान की पहचान और जमीन का मालिकाना—दो अलग अधिकार हैं। महिला किसान प्रमाणपत्र से जमीन उसके नाम नहीं होगी, उत्तराधिकार स्वतः नहीं मिलेगा और भूमि अभिलेख भी नहीं बदलेंगे। इसलिए यह कानून भूमि सुधार का विकल्प नहीं है। आलोचना यही है कि महिलाओं को पहचान मिली, लेकिन संपत्ति का पुनर्वितरण नहीं हुआ। यह सीमा है, पर कानून को निरर्थक नहीं बनाती। जमीन के स्वामित्व का प्रश्न अपनी जगह है और खेती में महिला के वास्तविक श्रम को मान्यता देने का प्रश्न अपनी जगह। दोनों को एक-दूसरे का विकल्प मानना उस बड़ी समस्या को छोटा करेगा, जिसे यह कानून पहली बार सामने ला रहा है।
कानून की असली परीक्षा कागज पर नहीं, गांव की चौपाल पर होगी। ग्रामसभा निष्पक्ष रही तो यह व्यवस्था जमीन पर उतरेगी; पक्षपात हुआ तो नए प्रमाणपत्र के बावजूद महिलाओं की पुरानी अदृश्यता बनी रहेगी। डिजिटल डेटाबेस पारदर्शी और आवेदन सरल होना जरूरी है। अधिकारियों को भी समझना होगा कि ग्रामीण महिला सरकारी प्रक्रिया की भाषा से कम, खेती की भाषा से अधिक परिचित है। यदि प्रमाणपत्र के लिए उसे फिर उन्हीं कागजी अड़चनों से गुजरना पड़ा, जिन्होंने उसे अब तक व्यवस्था से बाहर रखा, तो कानून का उद्देश्य कमजोर होगा। पहचान पहला कदम है; उसे दुरुपयोग से बचाकर वास्तविक लाभ तक पहुंचाना अगली और बड़ी चुनौती है।
महाराष्ट्र ने सवाल अपने लिए उठाया है, लेकिन जवाब पूरे देश को देना है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे कृषि प्रधान राज्यों में भी खेतों की रीढ़ महिलाओं का श्रम है। भूमि व्यवस्था भले अलग हो, श्रम और स्वामित्व के बीच की दूरी लगभग हर जगह है। अब दूसरे राज्यों को तय करना होगा कि किसान की पुरानी परिभाषा थामे रहें या खेती की वास्तविकता के अनुसार उसे बदलें। केंद्र भी इस मॉडल को राष्ट्रीय ढांचे में अपनाने पर विचार कर सकता है। कई राज्य महिला किसान की स्वतंत्र पहचान स्वीकार करते हैं तो राष्ट्रीय किसान नीति, 2007 की दिशा को व्यावहारिक आधार मिलेगा। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2026 को महिला किसान वर्ष घोषित किए जाने के कारण इस पहल की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।
कानून की सफलता प्रमाणपत्रों से नहीं, बदली जिंदगी से मापी जाएगी। क्या महिला तय कर पाएगी कि कौन-सी फसल बोनी है? क्या बाजार और कीमत पर उसकी आवाज होगी? क्या खेती की आय पर उसका नियंत्रण बढ़ेगा? क्या वह अपने नाम ऋण लेकर उत्पादन बढ़ा सकेगी? यदि प्रमाणपत्र मिल गया, लेकिन खेती के फैसले दूसरों के हाथ में रहे, तो सशक्तीकरण अधूरा रहेगा। महाराष्ट्र ने बीज बो दिया है; अब उसे सिंचाई, बाजार और संस्थागत सहारे की जरूरत है। दूसरे राज्यों को भी यह बीज रोपना होगा। भारतीय कृषि का भविष्य केवल जमीन के कागजों में नहीं, उन हाथों में भी है जिनके पसीने से खेत हरा होता है। महाराष्ट्र का कानून पहली बार उसी अनदेखे हाथ को कानूनी पहचान देने की कोशिश है।
— प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
