कहानी

कहानी – उजाले की तरफ़

सुबह के 6 बजे थे। मिथिलेश अपनी साइकिल पर सवार होकर स्कूल की तरफ़ निकल चुका था। रास्ते में धुंध इतनी घनी थी कि सामने की सड़क भी ठीक से दिखाई नहीं दे रही थी, फिर भी उसके पैर पैडल पर उसी रफ़्तार से चल रहे थे, जैसे रोज़ चलते थे। यह वही रास्ता था जिस पर वह पिछले 5 साल से चल रहा था, पहले छात्र के रूप में और अब गाँव के उसी स्कूल में सहायक अध्यापक के रूप में।

मिथिलेश की उम्र 26 साल थी। पिता खेतिहर मज़दूर थे और माँ घर के काम के साथ साथ दूसरों के खेतों में मज़दूरी भी करती थीं। घर में तीन छोटे भाई बहन थे, जिनकी पढ़ाई और भविष्य की पूरी ज़िम्मेदारी अब मिथिलेश के कंधों पर थी। सरकारी नौकरी की परीक्षा में लगातार दो बार असफल होने के बाद उसने यह अस्थायी अध्यापक की नौकरी पकड़ ली थी, ताकि घर का खर्च चल सके और भाई बहनों की पढ़ाई रुके नहीं।

स्कूल पहुँचकर उसने अपनी साइकिल पीपल के पेड़ के नीचे खड़ी की और कक्षा की तरफ़ बढ़ गया। कक्षा में 40 बच्चे बैठे थे, सब फटे बस्ते और पुरानी किताबों के साथ। मिथिलेश ने हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए पढ़ाना शुरू किया, लेकिन भीतर एक अजीब सी थकान और खालीपन उसे लगातार घेरे हुए था। रात को देर तक जगकर वह अगली परीक्षा की तैयारी करता, दिन में बच्चों को पढ़ाता और शाम को घर के छोटे मोटे काम निपटाता। नींद के लिए मुश्किल से 4 घंटे बचते थे।

पिछले महीने आए परीक्षा परिणाम ने उसे भीतर तक हिला दिया था। सिर्फ़ 2 अंकों से वह मुख्य सूची से बाहर रह गया था। उस दिन उसने किसी को कुछ नहीं बताया। घर पहुँचकर माँ के पूछने पर बस इतना कहा कि परिणाम अभी नहीं आया। झूठ बोलते समय उसकी आवाज़ काँप गई थी, पर माँ की आँखों में उम्मीद देखकर वह सच नहीं बता सका।

उस रात मिथिलेश छत पर अकेला बैठा रहा। आसमान में तारे बिखरे थे, पर उसका मन उतना ही उलझा हुआ था जितनी दिन की धूल भरी गलियाँ। उसे लगने लगा था कि जितनी मेहनत वह कर रहा है, उतना उसे मिल नहीं रहा। परिवार की उम्मीदें, समाज के ताने, अपनी उम्र का दबाव, यह सब मिलकर उसके अंदर एक भारी बोझ बन चुके थे। कई बार उसे लगता कि वह बस मशीन की तरह जी रहा है, बिना किसी असली खुशी के।

तभी नीचे से उसकी छोटी बहन रश्मि की आवाज़ आई। वह 12 साल की थी और अगले हफ़्ते होने वाली विज्ञान प्रतियोगिता के लिए एक मॉडल बना रही थी। उसने ऊपर आकर भैया को बुलाया, “भैया, ज़रा देखिए न, यह तार सही जगह पर लग रहा है या नहीं।”

मिथिलेश नीचे उतर आया। रश्मि ने गत्ते और रंगीन कागज़ से सौरमंडल का एक छोटा सा मॉडल बनाया था। उसकी आँखों में जो चमक थी, वह मिथिलेश को अपने बचपन के दिनों की याद दिला गई, जब वह भी इसी तरह छोटी छोटी चीज़ों में खुशी ढूंढ लेता था। उसने तार ठीक किया और रश्मि के साथ बैठकर बाकी काम भी पूरा करवाया। काम करते करते पहली बार उस दिन उसके चेहरे पर सच्ची मुस्कान आई।

अगले दिन स्कूल में एक बच्चा, जिसका नाम राजू था, गणित का सवाल हल नहीं कर पा रहा था। बार बार गलती करने पर वह रोने लगा। मिथिलेश उसके पास बैठा और धीरे से बोला, “राजू, एक बार गलत होने का मतलब यह नहीं कि तुम कभी सही नहीं कर पाओगे। मैं भी बहुत बार गलत होता हूँ, फिर कोशिश करता हूँ।” राजू ने आँसू पोंछे और दोबारा सवाल हल करने में जुट गया। थोड़ी देर बाद जब उसने सही जवाब निकाला, तो उसकी हँसी पूरी कक्षा में गूंज उठी।

उस पल मिथिलेश को एहसास हुआ कि जो बात वह राजू को समझा रहा था, वही बात वह खुद अपने आप को नहीं समझा पा रहा था। एक असफलता पूरी कहानी नहीं होती। रास्ता लंबा ज़रूर हो सकता है, पर बंद नहीं होता।

शाम को घर लौटते समय उसने रास्ते में साइकिल रोककर कुछ देर के लिए खेतों की तरफ़ देखा। दूर क्षितिज पर सूरज डूब रहा था, आसमान नारंगी और लाल रंगों में रंगा हुआ था। उसने गहरी साँस ली। पहली बार कई हफ़्तों में उसे लगा कि उसके सीने पर रखा बोझ थोड़ा हल्का हुआ है।

रात को उसने माँ के पास बैठकर सच बता दिया कि वह परीक्षा में सफल नहीं हो पाया। माँ ने उसका हाथ अपने हाथों में लेकर कहा, “बेटा, हम तुझसे सिर्फ़ इतना चाहते हैं कि तू कोशिश करता रहे। बाकी सब अपने आप ठीक हो जाएगा।” उन शब्दों ने मिथिलेश के भीतर जमी हुई चुप्पी को थोड़ा पिघला दिया। पहली बार उसने अपनी थकान और डर के बारे में खुलकर बात की, और माँ ने पूरी शांति से उसे सुना।

अगली सुबह मिथिलेश फिर उसी धुंध भरे रास्ते पर साइकिल चलाते हुए स्कूल की तरफ़ निकला। रास्ता वही था, पर उसके भीतर कुछ बदल चुका था। उसने तय किया कि वह अगली परीक्षा की तैयारी फिर से शुरू करेगा, इस बार खुद पर थोड़ी नरमी रखते हुए। कभी कभी हार मानने का मन ज़रूर होता है, पर हर सुबह उठकर फिर से कोशिश करना ही असली जीत होती है। धुंध चाहे जितनी घनी हो, सूरज हर रोज़ अपनी जगह पर निकलता ही है, और मिथिलेश ने आज फिर उसी उजाले की तरफ़ पैडल मारना शुरू कर दिया।

— महेन्द्र तिवारी

महेन्द्र तिवारी

जन्म : फरवरी 1971, भोजपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र), डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा सेवाएं : भूतपूर्व वायुसैनिक एवं वर्तमान में राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में कार्यरत कृतियाँ : विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में अब तक सैकड़ों लेख, कविताएँ और कहानियाँ प्रकाशित। संपादन : ‘दि ग्राम टुडे’ लघुकथा विशेषांक (अतिथि संपादक) प्रकाशन : कहानी संग्रह - एक लेखक का पुनर्जन्म (शीघ्र प्रकाश्य) मोबाइल : (+91) 9989703240 ई-मेल : mahendratone@gmail.com

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