सामूहिक सामर्थ्य की ओर
विस्तार हुआ अब ज़रूरत है, आधार बनाने की,
बिखरी हुई हरेक शक्ति को फिर, साथ लाने की।
“ब्रिक्स” देशों का समूह नहीं, सपनों का संगम है,
दक्षिण की आवाज़ विश्व में, लाने का संकल्प है।
अर्थव्यवस्था हो या तकनीक, व्यापार हो या ज्ञान,
साझेदारी के मजबूत पुलों से, बढ़े सभी का मान।
न कोई छोटा, न कोई बड़ा, साझा हित हो पहचान,
मतभेद रहें तो संवाद रहे, यहीं तो हो इसकी शान।
भारत धरा से उठे स्वर, विश्व-व्यवस्था राह दिखाए,
विविधताओं में एका रख, संतुलन के दीप जलाए।
विस्तार तभी सार्थक होगा, जब सामर्थ्य साथ बढ़े,
ब्रिक्स की शक्ति घोषणा से, धरा पर परिणाम गढ़े।
नई सदी के इस पड़ाव पर, परीक्षा यही है आज—,
सामूहिक शक्ति बनेगी, विकास का सच्चा समाज?
विस्तार से आगे, विश्वास हो, सहयोग से नई उड़ान,
ब्रिक्स बने मजबूत सेतु, दुनिया में संतुलन सम्मान।
(संदर्भ – दिल्ली में हो रहीं ब्रिक्स की बैठक।)
— संजय एम तराणेकर
