छटपटाहट
मैं सोचता हूँ
लोग छोटी-छोटी बातों से
ताव खा जाते हैं
जैसे किसी की जिंदगी
पाव के बराबर समझते हैं
थोड़ी चालाकी सीखकर
बड़ा बुध्दिमान समझते हैं
ऐसा मक्कड़जाल बुनते हैं
खुद जाल में फंस जाते हैं
तब एक छटपटाहट
ऐसी मचती है
सचमुच मैं गलत था
जिसका परिणाम सामने है
तब सच के सारे दरवाजों पर
ताले लटके मिलते हैं
तब कोई सच
तुमको नहीं बचा सकता है
— जयचन्द प्रजापति ‘जय’
