सोरठा – सत्ता
गया देश को भूल, सत्ता – मद में आदमी।नाशी बुद्धि समूल,कर्म-धर्म करता नहीं।।जन-सेवा से दूर, सत्ता के भूखे सभी।भावहीन भरपूर,
Read Moreगया देश को भूल, सत्ता – मद में आदमी।नाशी बुद्धि समूल,कर्म-धर्म करता नहीं।।जन-सेवा से दूर, सत्ता के भूखे सभी।भावहीन भरपूर,
Read Moreगंगा यमुना सरस्वती, प्रियल त्रिवेणी धार।अग-जग को नित तारती,करती जन उपकार।। महाकुंभ मेला लगा, तीरथराज प्रयाग,मन मैला अघ ओघ से,मन
Read Moreजंगल में मंगल कर आएँ।चलो साथियो नाचें – गाएँ।। घनी झाड़ियाँ काँटों वाली।बजा रहीं पत्तों की ताली।।काँटे नहीं कहीं चुभ
Read Moreमैं एक नन्हा – सा मच्छर हूँ।यह आप सब बहुत अच्छी तरह से जानते हैं।जितना ही मैं आपके निकट आता
Read Moreगया बीता हुआ बचपनभुलाया ही नहीं जाता। न भाता था मुझे पढ़नासदा ही मस्त खेलों मेंनहीं स्कूल मैं जाताभ्रमणता खेत
Read Moreशीत बढ़ी भा रही रजाई।मौसम ने अब ली अँगड़ाई।। शी – शी करतीं दादी नानी।नहीं सुहाता शीतल पानी।।दिन में धूप
Read Moreसुबह हो गई है।मोबाइल जाग गए हैं।रात में जो स्वप्न आ रहे थे,वे सब भाग गए हैं।रसोइयों में बर्तनों की
Read Moreवे दिन नहीं लौट कर आतेजो बचपन में बीते। सर्दी गर्मी नहीं सताएसावन भादों बरसे।रहे प्रफुल्लित बचपन खिलताहरसे हरसे हरसे।।हृदय
Read Moreसब कुछ बदल रहा क्षण-क्षण में।प्रभु का वास यहाँ कण-कण में।। शांति नहीं मानव को प्यारी,जुटा हुआ पल – पल
Read Moreयों तो निकालाजा सकता हैकिसी काँटे से काँटा भी,पर वे मानते हैंउनका जन्म हीहुआ मात्र चुभने के लिए। उलझना और
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